Friday, June 19, 2026
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उत्तराखंड: सरकारी कर्मचारियों पर SC/ST एक्ट के तहत केस दर्ज करने से पहले प्रशासनिक जांच अनिवार्य, नैनीताल हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

उत्तराखंड: सरकारी कर्मचारियों पर SC/ST एक्ट के तहत केस दर्ज करने से पहले प्रशासनिक जांच अनिवार्य, नैनीताल हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

​नैनीताल: उत्तराखंड में सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (एससी/एसटी) अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत कार्रवाई को लेकर नैनीताल हाई कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि राज्य में किसी भी लोक सेवक (सरकारी अधिकारी/कर्मचारी) के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज करने से पहले एक विस्तृत प्रशासनिक जांच कराना कानूनी रूप से अनिवार्य होगा।

​जस्टिस आलोक मेहरा की एकलपीठ ने सुनाया फैसला

​यह ऐतिहासिक आदेश बुधवार (17 जून) को जस्टिस आलोक मेहरा की एकलपीठ ने तत्कालीन पुलिस क्षेत्राधिकारी (सीओ) भूपेंद्र धोनी और उपनिरीक्षक (एसआई) रमेश बोहरा की याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया। हाई कोर्ट ने इस मामले में हल्द्वानी के मुखानी थाना क्षेत्र से जुड़े सत्र न्यायालय (सेशन कोर्ट) के पुराने आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया है।

​हाई कोर्ट ने कहा– “सेशन कोर्ट ने किया कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन”

​सुनवाई के दौरान नैनीताल हाई कोर्ट ने निचली अदालत के रुख पर सख्त टिप्पणी की। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सत्र न्यायालय ने बिना किसी प्रशासनिक जांच रिपोर्ट के लोक सेवकों के खिलाफ सीधे मुकदमा दर्ज करने का निर्देश देकर स्थापित कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन किया है। अपने आदेश की पुष्टि के लिए हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) द्वारा विभिन्न फैसलों में प्रतिपादित किए गए न्यायिक सिद्धांतों का भी हवाला दिया।

​अदालत ने साफ तौर पर कहा:

​”किसी भी लोक सेवक के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज करने से पहले प्रशासनिक जांच में आरोपों की पुष्टि होना और उसकी संस्तुति (Recommendation) मिलना आवश्यक है।”

​क्या था पूरा मामला?

​यह मामला साल 2024 का है, जब हल्द्वानी की एक महिला ने कोर्ट में सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत एक अर्जी दाखिल की थी। महिला का आरोप था कि उसके साथ दुर्व्यवहार, मारपीट और जातिसूचक टिप्पणियां की गई थीं। महिला ने एक स्थानीय युवक के साथ-साथ मामले से जुड़े तत्कालीन सीओ भूपेंद्र धोनी और एसओ पर भी गंभीर आरोप लगाए थे।

​पुलिस जांच में नहीं मिले थे सबूत: महिला की शिकायत पर जब पुलिस ने शुरुआती जांच की, तो अधिकारियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों की कोई पुष्टि नहीं हुई। साक्ष्य न मिलने के कारण पुलिस ने मुकदमा दर्ज नहीं किया था।

​सेशन कोर्ट का आदेश: इसके बाद नैनीताल की जिला एवं सत्र अदालत ने महिला के परिवाद पर सुनवाई करते हुए आरोपी युवक के साथ-साथ तत्कालीन सीओ और एसओ के खिलाफ भी एससी/एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज करने का आदेश जारी कर दिया था।

​अधिकारियों को मिली बड़ी राहत

​सत्र न्यायालय के इसी आदेश को चुनौती देते हुए पुलिस अधिकारी भूपेंद्र धोनी और रमेश बोहरा ने नैनीताल हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद न केवल इन दोनों अधिकारियों को बड़ी राहत मिली है, बल्कि भविष्य के लिए भी यह साफ हो गया है कि राज्य में किसी भी सरकारी कर्मचारी पर इस अधिनियम के तहत सीधे एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकेगी; पहले उसकी प्रशासनिक जांच होना अनिवार्य होगा।

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