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यूएस-ईरान डील के बाद भारत में पेट्रोलियम सप्लाई सामान्य, एलपीजी बैकलॉग घटा; कीमतों में कटौती पर सरकार का बड़ा बयान

यूएस-ईरान डील के बाद भारत में पेट्रोलियम सप्लाई सामान्य, एलपीजी बैकलॉग घटा; कीमतों में कटौती पर सरकार का बड़ा बयान

​नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच हुए ऐतिहासिक शांति समझौते के बाद भारत सरकार ने आम जनता को बड़ी राहत दी है। पेट्रोलियम मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने आज जानकारी दी कि देश में रसोई गैस (LPG) का बैकलॉग घटकर अब मात्र 3.1 दिन रह गया है। इसके साथ ही पेट्रोल, डीजल, एलपीजी और नेचुरल गैस की सप्लाई पूरी तरह सामान्य हो गई है और देश के सभी रिटेल आउटलेट्स पर ऑपरेशंस सामान्य रूप से चल रहे हैं। इसका सीधा मतलब है कि अब देश की किसी भी गैस एजेंसी पर एलपीजी की किल्लत नहीं है।

​क्या कम होंगी पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कीमतें?

​सप्लाई सामान्य होने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या युद्ध के दौरान बढ़ाई गई ईंधन की कीमतों में सरकार कटौती करेगी?

​इस सवाल पर संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने कहा, “सरकार इस पूरे मामले पर बारीकी से ध्यान दे रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदलती स्थितियों और वैश्विक बाजार को देखते हुए ही खुदरा (रिटेल) कीमतों को कम करने के बारे में कोई अंतिम फैसला लिया जाएगा।”

​कंपनियों का घाटा (अंडर-रिकवरी) अब भी बड़ी चुनौती

​कीमतों में तुरंत कटौती न होने के पीछे सरकारी तेल कंपनियों को हो रहा भारी नुकसान है। संयुक्त सचिव ने सोमवार को आंकड़ों को साझा करते हुए बताया था कि कीमतें बढ़ने के बावजूद तेल कंपनियों को प्रति सिलेंडर और लीटर पर भारी नुकसान (अंडर-रिकवरी) उठाना पड़ रहा है:

​घरेलू LPG सिलेंडर: प्रति सिलेंडर आज भी ₹700 की अंडर-रिकवरी है।

​डीजल: प्रति लीटर ₹27 का नुकसान हो रहा है।

​पेट्रोल: प्रति लीटर ₹3 की अंडर-रिकवरी बनी हुई है।

​इस घाटे के कारण पिछले एक साल में घरेलू एलपीजी पर कुल अंडर-रिकवरी बढ़कर ₹60,000 करोड़ होने का अनुमान है, जो इससे पिछले साल ₹41,338 करोड़ थी।

​108 दिनों के युद्ध ने बढ़ाई मुश्किलें, रूट बदलने से बढ़ा खर्च

​भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल, 50% एलएनजी (LNG) और 60% एलपीजी (LPG) अंतरराष्ट्रीय बाजारों से आयात करता है। मध्य पूर्व एशिया में युद्ध शुरू होने से पहले इसका एक बड़ा हिस्सा ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (होर्मुज जलडमरूमध्य) के रास्ते भारत आता था।

​28 फरवरी, 2026 को युद्ध शुरू होने के बाद पिछले 108 दिनों के दौरान वैश्विक स्तर पर पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की सप्लाई बुरी तरह बाधित हुई। इस संकट से निपटने के लिए भारत सरकार ने तेल कंपनियों के साथ मिलकर आयात के स्रोतों को डायवर्सिफाई (विविधता) किया और नए देशों से स्टॉक मंगाना शुरू किया। हालांकि, रूट बदलने और नए बाजारों के कारण माल ढुलाई तथा आयात का खर्च काफी बढ़ गया।

​कंपनियों को रोज हो रहा था ₹652 करोड़ का नुकसान, सरकार ने दी मदद

​एक वरिष्ठ सरकारी प्रतिनिधि के मुताबिक, पिछले हफ्ते तक पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कीमतों में बढ़ोतरी के बाद भी सरकारी तेल कंपनियों को हर दिन करीब ₹652 करोड़ रुपये का भारी आर्थिक नुकसान हो रहा था।

​युद्ध के दौरान आम जनता पर बढ़ती कीमतों का सीधा बोझ न पड़े, इसके लिए भारत सरकार ने शुरुआती 78 दिनों में सरकारी तेल कंपनियों को आर्थिक मदद (बेलआउट) के तौर पर लगभग 1.23 लाख करोड़ रुपये जारी किए। सरकारी सूत्रों के अनुसार, इसमें पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी (उत्पाद शुल्क) में की गई कटौती भी शामिल थी, जिसके जरिए केंद्र सरकार ने टैक्स से होने वाली अपनी कमाई को छोड़कर तेल कंपनियों के बढ़ते घाटे को कम करने का प्रयास किया था। अब अमेरिका और ईरान के बीच एमओयू साइन होने के बाद आने वाले दिनों में वैश्विक बाजार सुधरने पर कीमतें घटने की उम्मीद जताई जा रही है।

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