टेलीग्राम बैन मामला: दिल्ली हाई कोर्ट ने सुरक्षित रखा फैसला; केंद्र ने कहा– ‘यह प्लेटफॉर्म फ्रेंकस्टीन जैसा, 2024 में बदला गया था पेपर का टाइम-डेट’
टेलीग्राम बैन मामला: दिल्ली हाई कोर्ट ने सुरक्षित रखा फैसला; केंद्र ने कहा– ‘यह प्लेटफॉर्म फ्रेंकस्टीन जैसा, 2024 में बदला गया था पेपर का टाइम-डेट’
नई दिल्ली: राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET) से ठीक पहले मैसेजिंग प्लेटफॉर्म टेलीग्राम पर केंद्र सरकार द्वारा लगाए गए अस्थायी प्रतिबंध को चुनौती देने वाली याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट ने गुरुवार को अपनी सुनवाई पूरी कर ली। जस्टिस तेजस कारिया की एकल पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद इस संवेदनशील मामले पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।
”क्या एक घटना के लिए पूरे प्लेटफॉर्म को ब्लॉक कर सकते हैं?”: हाई कोर्ट
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सरकार के इस कदम की आनुपातिकता (Proportionality) पर सवाल उठाए। जस्टिस तेजस कारिया ने टिप्पणी करते हुए कहा:
”हम 150 मिलियन (15 करोड़) उपयोगकर्ताओं के अधिकारों को सिर्फ इसलिए कैसे रोक सकते हैं, क्योंकि कुछ नागरिक परीक्षा दे रहे हैं? सवाल यह है कि क्या आप किसी और के अधिकारों की रक्षा के लिए किसी और के अधिकारों को रोक सकते हैं?”
अदालत ने स्वीकार किया कि परीक्षा में जो हुआ उससे कई छात्रों पर असर पड़ा, लेकिन सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69ए के तहत मिली शक्तियों के सीमित इस्तेमाल पर जोर दिया। कोर्ट ने कहा कि अगर कानून-व्यवस्था (Law & Order) की स्थिति हो तो प्रतिबंध जायज है, लेकिन यहां प्रोपोर्शनैलिटी टेस्ट का मामला है।
केंद्र की दलील: करोड़ों छात्रों के भविष्य और परीक्षा की विश्वसनीयता का सवाल
सरकार की ओर से पक्ष रखते हुए सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने प्रतिबंध का पुरजोर समर्थन किया। उन्होंने अदालत को बताया कि कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता वाली रिव्यू कमेटी ने टेलीग्राम के अधिकारियों की दलीलें सुनने के बाद ही अंतरिम निर्देश की पुष्टि की है।
सॉलिसिटर जनरल ने टेलीग्राम के तकनीकी ढांचे पर सवाल उठाते हुए इसे ‘फ्रेंकस्टीन’ (टुकड़ों से बना और असंगठित) करार दिया। उन्होंने तर्क दिए:
डेट और टाइम एडिटिंग फीचर का दुरुपयोग: टेलीग्राम में एक ऐसा फीचर है जिससे पोस्ट की तारीख और समय को बदला जा सकता है। वर्ष 2024 में ऐसा देखा गया था कि 21 जून को परीक्षा खत्म होने के बाद पेपर हासिल कर उसे 22 जून को पोस्ट किया गया, लेकिन टाइम-डेट बदलकर उसे 18 जून का दिखा दिया गया ताकि यह लगे कि पेपर पहले ही लीक हो गया था। इससे राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा की क्रेडिबिलिटी खराब होती है।
गोपनीयता नीति का हवाला: टेलीग्राम की प्राइवेसी पॉलिसी के अनुसार, अकाउंट डिलीट होते ही सारा डेटा और मीडिया सर्वर से साफ हो जाता है, जिससे जांच एजेंसियों को दिक्कत आती है। यह आतंकवादी गतिविधियों के लिए भी सबसे पसंदीदा प्लेटफॉर्म बन चुका है।
अन्य प्लेटफॉर्म से तुलना: सरकार ने साफ किया कि व्हाट्सएप जैसे ज्यादा शक्तिशाली प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई क्योंकि उनके पास खुद का फिल्टरेशन सिस्टम है, जबकि टेलीग्राम के पास ऐसा कोई आर्किटेक्चर नहीं है।
टेलीग्राम की दलील: क्या नीट परीक्षा देश की अखंडता के लिए खतरा है?
टेलीग्राम की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ध्रुव मेहता ने सरकार के आदेश को कानूनी खामियों से ग्रस्त बताया। उन्होंने सवाल उठाया:
”क्या केंद्र सरकार का यह आदेश भारत की अखंडता और संप्रभुता के हित में है? क्या नीट जैसी परीक्षा भारत की संप्रभुता पर असर डालेगी? यदि (प्रतिबंध का) आधार ही खत्म हो जाता है, तो उसके आधार पर पारित आदेश भी नहीं टिक सकता।”
उन्होंने दलील दी कि कानून इस तरह के भेदभावपूर्ण प्रतिबंध की इजाजत नहीं देता। टेलीग्राम पर केवल परीक्षा से जुड़ी चीजें ही नहीं, बल्कि सैकड़ों व्यावसायिक गतिविधियां (Business Activities) भी चल रही हैं, जो इस प्रतिबंध से प्रभावित हुई हैं।
कोर्ट की अंतिम टिप्पणी
अदालत ने सॉलिसिटर जनरल के ‘अनुराधा भसीन’ मामले के संदर्भ (संभावित नुकसान और सार्वजनिक नुकसान के बीच संतुलन) को सुना। कोर्ट ने अंत में कहा कि वह पूरी प्रक्रिया की समीक्षा करेगा, लेकिन विचारणीय पहलू यह है कि क्या ऐप का अपना आर्किटेक्चर काफी नहीं था जिसके कारण सरकार को अपनी ‘इमरजेंसी पावर्स’ का इस्तेमाल करना पड़ा। हाई कोर्ट जल्द ही इस पर अपना अंतिम आदेश सुनाएगा।
