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आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस: ‘RWA पर छोड़ें फैसला’, सॉलिसिटर जनरल की दलील, कुत्ते का मूड पढ़ना मुश्किल!

आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस: ‘RWA पर छोड़ें फैसला’, सॉलिसिटर जनरल की दलील, कुत्ते का मूड पढ़ना मुश्किल!

नई दिल्ली, 7 जनवरी 2026: सुप्रीम कोर्ट में आवारा कुत्तों (स्ट्रे डॉग्स) की समस्या पर आज लाइव सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बड़ा तर्क दिया। उन्होंने कहा कि व्यक्तिगत, भावनात्मक या सहानुभूतिपूर्ण दलीलों की बजाय आवारा कुत्तों को सोसाइटी में रखने या हटाने का निर्णय रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) पर छोड़ा जाना चाहिए। मेहता ने जोर देकर कहा कि वे कुत्तों या पशु कल्याण के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन कमजोर नागरिकों – बच्चों और बुजुर्गों – की सुरक्षा सबसे ऊपर है।

जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की स्पेशल बेंच ने सुनवाई शुरू करते ही कहा, “कुत्ते का मूड क्या है, यह पढ़ना मुश्किल है – कब काट ले, पता नहीं।” बेंच ने हाईवे पर आवारा पशुओं से सुरक्षा चिंताएं उठाईं और राज्यों की लापरवाही पर नाराजगी जताई। सॉलिसिटर जनरल ने उदाहरण दिया कि अगर कोई सोसाइटी में भैंस या गाय रखना चाहे तो क्या होगा? उन्होंने मास रिमूवल के जोखिम पर भी बहस का जिक्र किया।

पशु प्रेमियों की ओर से कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि 1.5 करोड़ आवारा कुत्तों को खिलाना असंभव है, जबकि कुछ वकीलों ने सफल राज्यों के पशुपालन विभागों से कमिटी बनाने की मांग की। बेंच ने कहा कि मौजूदा कानून के तहत कुत्तों को मूल जगह पर लौटाना चाहिए, लेकिन वर्तमान आदेश इससे अलग है। सुनवाई में डॉग लवर्स और ‘हेटर्स’ दोनों की बातें सुनी गईं, जैसा कि बेंच ने पहले कहा था – “आज दोनों पक्ष सुनेंगे।”

यह मामला 2025 में बच्चों पर हमलों और रेबीज मामलों की बढ़ती घटनाओं पर स्वत: संज्ञान से शुरू हुआ था। पहले आदेशों में कुत्तों को शेल्टर में रखने के निर्देश थे, लेकिन बाद में ABC रूल्स (कैच-स्टरलाइज-वैक्सीनेट-रिलीज) को प्राथमिकता दी गई। अब RWA को अधिकार देने की दलील से सोसाइटी स्तर पर फैसला हो सकता है, जो स्थानीय निवासियों की सुरक्षा और पशु कल्याण के बीच संतुलन ला सकता है।

सुनवाई जारी है, और बेंच ने सभी पक्षों को सुनने का आश्वासन दिया। आवारा कुत्तों की आबादी और काटने की घटनाओं से जूझ रहे शहरों के लिए यह फैसला अहम होगा – क्या RWA को अधिकार मिलेगा या राष्ट्रीय नीति बनेगी, अगली सुनवाई में साफ हो सकता है।

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