Monday, April 27, 2026
टेक-ऑटो

AI निवेश के बीच टेक सेक्टर में छंटनी का सिलसिला तेज, ग्लोबल स्तर पर बहस छिड़ी

AI निवेश के बीच टेक सेक्टर में छंटनी का सिलसिला तेज, ग्लोबल स्तर पर बहस छिड़ी

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) में अरबों डॉलर के भारी निवेश के बावजूद वैश्विक टेक इंडस्ट्री में नौकरियों की छंटनी (layoffs) का दौर जारी है। साल 2026 के पहले चार महीनों में ही 73,000 से 80,000 से ज्यादा टेक जॉब्स कट चुके हैं, जिसमें मेटा, अमेजन, ओरेकल, अटलासियन और स्नैप जैसी बड़ी कंपनियां शामिल हैं। कंपनियां इन छंटनियों को AI से बढ़ती दक्षता और भारी AI इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च को फंड करने का हवाला दे रही हैं, लेकिन विशेषज्ञ इसे ‘AI वॉशिंग’ करार दे रहे हैं।

मेटा ने हाल ही में लगभग 8,000 नौकरियां (कुल वर्कफोर्स का 10%) काटने की घोषणा की है, साथ ही 6,000 ओपन पोजिशन्स को भरने से इनकार कर दिया। कंपनी 2026 में AI इंफ्रास्ट्रक्चर पर 115 से 135 बिलियन डॉलर तक खर्च करने की योजना बना रही है। अमेजन ने जनवरी में 16,000 कॉर्पोरेट रोल्स काटे, जबकि ओरेकल 20,000 से 30,000 नौकरियां घटाने की राह पर है। अटलासियन ने 10% वर्कफोर्स (करीब 1,600) काटते हुए कहा कि यह AI इन्वेस्टमेंट को ‘सेल्फ-फंड’ करने के लिए जरूरी है। ब्लॉक ने लगभग 4,000 (40% वर्कफोर्स) और स्नैप ने 1,000 जॉब्स काटे। कुल मिलाकर 95 से ज्यादा कंपनियों ने इस साल अब तक ये कदम उठाए हैं।

कंपनियों का तर्क है कि AI टूल्स और एजेंट्स से प्रोडक्टिविटी बढ़ रही है, जिससे कम लोगों से ज्यादा काम हो रहा है। मिडिल मैनेजमेंट, कस्टमर सपोर्ट और कुछ कोडिंग रोल्स अब ऑटोमेट हो रहे हैं। साथ ही, डेटा सेंटर्स, GPU चिप्स और AI मॉडल्स पर भारी कैपिटल एक्सपेंडिचर (capex) को बैलेंस करने के लिए नॉन-कोर रोल्स काटे जा रहे हैं। गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, मेटा और अमेजन मिलकर इस साल AI पर करीब 650-700 बिलियन डॉलर खर्च करने वाले हैं।

असल वजह पर तेज बहस

यह छंटनी वाकई AI की वजह से हो रही है या सिर्फ कॉस्ट कटिंग और शेयरधारकों के दबाव का नतीजा? यह सवाल अब गर्म है। कई एनालिस्ट्स और निवेशक मार्क एंड्रीसन जैसे कह रहे हैं कि कंपनियां ‘AI वॉशिंग’ कर रही हैं — यानी AI को सुविधाजनक बहाना बनाकर ओवर-हायरिंग के बाद सुधार, मार्जिन बचाने या पुरानी गलत निवेशों को छुपा रही हैं।

कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि AI अभी इतना परिपक्व नहीं कि इतने बड़े पैमाने पर जॉब्स रिप्लेस कर सके। असल में आर्थिक अनिश्चितता, विज्ञापन बाजार में मंदी और रेगुलेटरी मुद्दे भी भूमिका निभा रहे हैं। फिर भी, कंपनियां AI को ‘फ्यूचर-प्रूफिंग’ का लेबल देकर इन कदमों को जस्टिफाई कर रही हैं।

भारत पर क्या असर?

भारतीय आईटी सेक्टर (TCS, इंफोसिस, विप्रो आदि) भी इस ट्रेंड से प्रभावित है। अमेरिकी क्लाइंट्स के AI पर शिफ्ट होने से ट्रेडिशनल प्रोजेक्ट्स पर दबाव बढ़ा है। ओरेकल जैसी कंपनियों ने भारत में भी हजारों जॉब्स प्रभावित किए। भारतीय प्रोफेशनल्स के लिए AI/ML, डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रॉम्प्ट इंजीनियरिंग जैसी स्किल्स सीखना अब जरूरी हो गया है।

विश्लेषकों का कहना है कि यह शॉर्ट-टर्म में व्हाइट-कॉलर जॉब्स पर दबाव है, लेकिन लॉन्ग-टर्म में प्रोडक्टिविटी बढ़ने से नई नौकरियां भी पैदा हो सकती हैं। 2026 को ‘AI प्रूव-इट ईयर’ कहा जा रहा है, जहां हाइप से आगे जाकर AI का असली आर्थिक प्रभाव दिखना चाहिए।

टेक कर्मचारियों के लिए सलाह: AI टूल्स का इस्तेमाल सीखें, डोमेन एक्सपर्टीज बनाए रखें और खुद को बदलाव के लिए तैयार रखें। इतिहास गवाह है कि नई टेक्नोलॉजी पुरानी नौकरियां खत्म करती है, लेकिन नई संभावनाएं भी खोलती है।

(स्रोत: विभिन्न वैश्विक रिपोर्ट्स और कंपनी घोषणाएं)

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