ग्राउंड रिपोर्ट: खंडहर बना नैनीताल का गाड़ियूड़ा गांव; 500 परिवारों के शोर से 35 बुजुर्गों के सन्नाटे तक का सफर
उत्तराखंड के पहाड़ों से पलायन का दर्द कोई नई बात नहीं है, लेकिन नैनीताल जिले के धारी ब्लॉक से आई यह रिपोर्ट रोंगटे खड़े कर देने वाली है। जहाँ एक तरफ ‘रिवर्स पलायन’ के दावे किए जा रहे हैं, वहीं गाड़ियूड़ा गांव की सिसकती दीवारें हकीकत का आइना दिखा रही हैं।
ग्राउंड रिपोर्ट: खंडहर बना नैनीताल का गाड़ियूड़ा गांव; 500 परिवारों के शोर से 35 बुजुर्गों के सन्नाटे तक का सफर
पर्यटन नगरी नैनीताल से कुछ ही दूरी पर स्थित धारी ब्लॉक का गाड़ियूड़ा गांव आज उत्तराखंड के ‘भूतिया गांवों’ (Ghost Villages) की फेहरिस्त में शामिल होने की कगार पर है। कभी 500 से अधिक परिवारों की खुशहाली से महकने वाला यह गांव आज टूटी छतों, जर्जर दीवारों और बंद दरवाजों पर लटके जंग खाए तालों की कहानी बन गया है।
1. 10 साल में उजड़ गई खुशहाली
पिछले एक दशक में इस गांव ने सबसे भयावह पलायन देखा है। रोजगार की तलाश और बेहतर भविष्य की चाहत में युवा शहरों की ओर ऐसे निकले कि फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। आज गांव की कुल आबादी सिमटकर मात्र 35 लोगों तक रह गई है। ये वो बुजुर्ग हैं जिनके पास न तो शहर जाने का साधन है और न ही अपनी मिट्टी छोड़ने की हिम्मत।
2. बुनियादी सुविधाओं का अकाल: 110 KM दूर इलाज
गांव के उजड़ने की सबसे बड़ी वजह शिक्षा और स्वास्थ्य का अभाव है।
* स्वास्थ्य: आपात स्थिति में ग्रामीणों को 110 किलोमीटर दूर हल्द्वानी या 60 किलोमीटर दूर पदमपुरी जाना पड़ता है। कई बार अस्पताल पहुँचने से पहले ही मरीज दम तोड़ देते हैं।
* शिक्षा: गांव में अच्छे स्कूल न होने के कारण छोटे बच्चों को कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है, जिसके चलते अभिभावकों ने शहरों में बसना बेहतर समझा।
3. ‘सड़क पहले आएगी या सांस छूटेगी?’
आजादी के दशकों बाद भी गाड़ियूड़ा गांव तक पक्की सड़क नहीं पहुँच पाई है। मुख्य मार्ग तक पहुँचने के लिए आज भी 5 किलोमीटर का पैदल सफर तय करना पड़ता है। हालांकि, अब सड़क निर्माण को मंजूरी मिली है, लेकिन ग्रामीणों का दर्द गहरा है। बुजुर्गों का कहना है— “पता नहीं सड़क पहले आएगी या हमारी सांसें पहले छूट जाएंगी।”
4. खेती-किसानी पर ‘दोहरी मार’
कभी आलू, मटर और टमाटर के उत्पादन के लिए मशहूर यह गांव आज बंजर नजर आता है। इसके दो मुख्य कारण हैं:
* जंगली जानवरों का आतंक: सूअर और बंदरों ने खड़ी फसलें बर्बाद कर दीं, जिससे किसानों ने खेती से तौबा कर ली।
* मौसम की बेरुखी: अनिश्चित बारिश और सूखे ने रही-कसी कसर पूरी कर दी, जिससे दुग्ध उत्पादन और पशुपालन भी चौपट हो गया।
5. जिम्मेदार मौन, बुजुर्गों को अपनों का इंतजार
ग्रामीण प्रकाश जोशी और त्रिलोचन जोशी का कहना है कि सरकार के दावे केवल कागजों तक सीमित हैं। एसडीएम धारी, अंशुल भट्ट ने स्वीकार किया कि पलायन रोकने के लिए फिलहाल कोई विशेष योजना नहीं है, हालांकि स्वरोजगार और शिक्षा सुधार के प्रयास किए जा रहे हैं।
निष्कर्ष: गाड़ियूड़ा गांव की कहानी केवल एक गांव की नहीं, बल्कि पहाड़ के उस कड़वे सच की है जहाँ सुविधाएं न होने पर घर ‘मकान’ बनकर रह जाते हैं और गांव ‘खंडहर’। क्या प्रशासन की नींद तब खुलेगी जब गांव के आखिरी 35 दीये भी बुझ जाएंगे?
