Monday, June 8, 2026
राजनीति

राजस्थान कांग्रेस में फिर भड़की ‘चिट्ठी’ वाली आग: ’25 सितंबर 2022 का घटनाक्रम हाईकमान के नहीं, सचिन पायलट के खिलाफ बगावत थी’ – अशोक गहलोत का बड़ा दावा

राजस्थान कांग्रेस में फिर भड़की ‘चिट्ठी’ वाली आग: ’25 सितंबर 2022 का घटनाक्रम हाईकमान के नहीं, सचिन पायलट के खिलाफ बगावत थी’ – अशोक गहलोत का बड़ा दावा

​जयपुर: राजस्थान की राजनीति में एक बार फिर पुराने जख्म और सियासी विवाद खुलकर सामने आ गए हैं। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने 25 सितंबर 2022 के हाई-प्रोफाइल राजनीतिक घटनाक्रम को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला बयान दिया है। उन्होंने उन दावों को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें कहा जाता है कि उनके विधायकों ने कांग्रेस हाईकमान (गांधी परिवार) के खिलाफ बगावत की थी। गहलोत ने साफ लफ्जों में कहा कि वह घटना हाईकमान के खिलाफ नहीं, बल्कि सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनने से रोकने के लिए उनके खिलाफ विधायकों का गुस्सा थी।

​’अध्यक्ष बनने से रोकने के लिए मेरे खिलाफ रची गई थी साजिश’

​अशोक गहलोत ने आत्मनिरीक्षण करते हुए कहा कि उस समय वे स्वयं कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद की दौड़ में थे और उनके लिए यह जिम्मेदारी बहुत मायने रखती थी। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि मैं कोई अनपढ़ नेता नहीं हूं कि कांग्रेस राष्ट्रीय अध्यक्ष जैसी इतनी बड़ी जिम्मेदारी को केवल मुख्यमंत्री पद के मोह में छोड़ देता। इस पद का इतिहास बहुत गौरवशाली रहा है, जहां महात्मा गांधी, मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे महापुरुष रह चुके हैं। मैं इस पद की गरिमा को अच्छी तरह समझता हूं। मुझे पूरा यकीन है कि उस समय मुझे राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने से रोकने के लिए पर्दे के पीछे से कोई बड़ी साजिश रची गई थी, जिसके कारण अचानक पर्यवेक्षक आ गए, परिस्थितियां बदलीं और पूरा घटनाक्रम ही पलट गया।

​’मानेसर प्रकरण के बागियों को मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार नहीं करना चाहते थे विधायक’

​पूर्व मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि जब राजस्थान में नेतृत्व परिवर्तन (सीएम बदलने) की चर्चाएं तेज हुईं और यह माहौल बनाया गया कि सचिन पायलट को नया मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है, तब आम विधायकों में भारी आक्रोश फैल गया।

​गहलोत के अनुसार, विधायकों की साफ भावना थी कि यदि मुख्यमंत्री बदला ही जाना है, तो उन 102 विधायकों में से किसी को भी यह जिम्मेदारी सौंप दी जाए जो संकट के समय पार्टी के साथ खड़े रहे। लेकिन साल 2020 के ‘मानेसर प्रकरण’ (सरकार गिराने की कोशिश) में शामिल रहे किसी भी व्यक्ति को मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा। गहलोत ने दलील दी कि यह विधायकों की अपनी व्यक्तिगत और सामूहिक राय थी, न कि हाईकमान के खिलाफ कोई विद्रोह। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर यह बगावत हाईकमान के खिलाफ होती, तो नेतृत्व उन्हें बाद में भी मुख्यमंत्री पद पर क्यों बनाए रखता?

​’मैं किसी पद की दौड़ में नहीं, पायलट से कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं’

​अशोक गहलोत ने साफ किया कि वह अब किसी पद की दौड़ में शामिल नहीं हैं। तीन बार राजस्थान का मुख्यमंत्री रहने के बाद उनके मन में किसी पद की लालसा नहीं बची है और उनका एकमात्र उद्देश्य कांग्रेस संगठन को मजबूत करना है। भविष्य में कौन मुख्यमंत्री बनेगा, यह केवल वक्त और आलाकमान तय करेगा।

​सचिन पायलट के साथ अपने रिश्तों पर बात करते हुए गहलोत ने कहा:

​उनके और पायलट के बीच कोई व्यक्तिगत दुश्मनी या नफरत नहीं है।

​दोनों के बीच पुराने संबंध हैं और उनके बीच समय-समय पर बातचीत भी होती रहती है।

​वे पायलट को राजनीतिक विरोधी नहीं बल्कि एक साथी नेता मानकर काम करते हैं।

​हालांकि, उन्होंने एक बड़ी बात जोड़ते हुए कहा कि यदि मानेसर प्रकरण के बाद सचिन पायलट ने “भूलो और माफ करो” की लोकतांत्रिक भावना को दिल से स्वीकार किया होता, तो यह पूरा विवाद बहुत पहले ही हमेशा के लिए खत्म हो चुका होता।

​क्या था 25 सितंबर 2022 का पूरा सियासी घटनाक्रम?

​राजस्थान कांग्रेस के इतिहास में 25 सितंबर 2022 का दिन सबसे बड़े सियासी ड्रामे के रूप में दर्ज है। उस समय अशोक गहलोत कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव लड़ने वाले थे और ‘एक व्यक्ति-एक पद’ के नियम के तहत राजस्थान में नया मुख्यमंत्री चुना जाना था।

​इसके लिए जयपुर में मल्लिकार्जुन खड़गे और अजय माकन की मौजूदगी में आधिकारिक विधायक दल (CLP) की बैठक बुलाई गई थी। लेकिन सचिन पायलट को सीएम बनाए जाने की भनक लगते ही गहलोत खेमे के 90 से अधिक विधायक उस बैठक का बहिष्कार कर सीधे तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष डॉ. सीपी जोशी के आवास पर पहुंच गए और सामूहिक इस्तीफे की पेशकश कर दी। इस घटना को तत्कालीन समय में कांग्रेस आलाकमान के आदेशों की खुली अवहेलना और बड़ी अनुशासनहीनता माना गया था, जिसने पूरी कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति को हिलाकर रख दिया था।

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