दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला अरावली: हिमालय से भी प्राचीन, अब अस्तित्व की लड़ाई
दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला अरावली: हिमालय से भी प्राचीन, अब अस्तित्व की लड़ाई
नई दिल्ली, 22 दिसंबर 2025: अरावली पर्वत श्रृंखला, जो दुनिया की सबसे पुरानी फोल्ड माउंटेन सिस्टम में से एक है, आज गंभीर संकट का सामना कर रही है। इसकी आयु लगभग 2 से 3 अरब वर्ष मानी जाती है – हिमालय से सैकड़ों मिलियन वर्ष पुरानी। गुजरात से दिल्ली तक करीब 690-800 किलोमीटर में फैली यह श्रृंखला थार मरुस्थल के विस्तार को रोकती है, भूजल रिचार्ज करती है, जैव विविधता का खजाना है और दिल्ली-एनसीआर सहित उत्तर-पश्चिम भारत की जलवायु को संतुलित रखती है। लेकिन अवैध खनन, वनों की कटाई और शहरीकरण ने इसे खोखला कर दिया है।
अरावली का भूवैज्ञानिक इतिहास गोडवाना महाद्वीप से जुड़ा है। प्राचीन काल में यहां तांबा और अन्य धातुओं का खनन होता था, जो सिंधु घाटी सभ्यता तक जाता है। यह चंबल, साबरमती, लूनी जैसी नदियों का उद्गम स्थल है और दिल्ली रिज इसका उत्तरी विस्तार है। पर्यावरणीय रूप से यह थार के रेगिस्तान को गंगा के मैदानों तक फैलने से रोकती है, वन्यजीवों (तेंदुआ, हाइना, 200 से अधिक पक्षी प्रजातियां) को आश्रय देती है और एनसीआर की हवा को धूल से बचाती है।
हालांकि, पिछले चार दशकों में अंधाधुंध खनन ने इसे बर्बाद कर दिया। संगमरमर, ग्रेनाइट, लाइमस्टोन जैसे खनिजों के लिए पहाड़ियां गायब हो रही हैं। अवैध खनन से भूजल स्तर गिरा, प्रदूषण बढ़ा और वन्यजीवों का निवास नष्ट हुआ। 1992 की अरावली नोटिफिकेशन और 2009 के सुप्रीम कोर्ट बैन के बावजूद समस्या बनी रही।
ताजा विवाद नवंबर 2025 के सुप्रीम कोर्ट फैसले से उपजा, जिसमें पर्यावरण मंत्रालय की सिफारिश पर अरावली को ‘100 मीटर से ऊंची पहाड़ियां’ तक सीमित कर दिया गया। पर्यावरणविदों के अनुसार, इससे 90% से अधिक क्षेत्र (खासकर राजस्थान में) संरक्षण से बाहर हो जाएगा, खनन बढ़ेगा और मरुस्थलीकरण तेज होगा। #SaveAravalli कैंपेन सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहा है। पूर्व सीएम अशोक गहलोत ने इसे ‘डेथ वारंट’ कहा।
सरकार का दावा है कि 90% क्षेत्र संरक्षित रहेगा, नए खनन लीज पर रोक है और सस्टेनेबल प्लान बनेगा। मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा, दिल्ली अरावली में खनन पूरी तरह प्रतिबंधित है। लेकिन विशेषज्ञ चेताते हैं कि निचली ढलानें और रिचार्ज जोन नष्ट हुए तो दिल्ली-एनसीआर की पानी और हवा की सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी।
अरावली को बचाना जरूरी है – यह सिर्फ पहाड़ियां नहीं, उत्तर भारत की जीवनरेखा है। ग्रेट ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट जैसी पहल उम्मीद जगाती हैं, लेकिन सख्त कानून और सामुदायिक भागीदारी के बिना यह प्राचीन धरोहर खो जाएगी।
