राजनीति

केंद्र सरकार ने अमेरिकी कपास पर 11% आयात शुल्क हटाया, अरविंद केजरीवाल ने लगाया किसानों के साथ विश्वासघात का आरोप

केंद्र सरकार ने अमेरिकी कपास पर 11% आयात शुल्क हटाया, अरविंद केजरीवाल ने लगाया किसानों के साथ विश्वासघात का आरोप

केंद्र सरकार ने अमेरिका से आयात होने वाले कपास पर लगने वाले 11 प्रतिशत आयात शुल्क और कृषि अवसंरचना विकास उपकर (एआईडीसी) को हटाने का फैसला किया है। यह छूट, जो पहले 19 अगस्त से 30 सितंबर तक लागू थी, अब 31 दिसंबर 2025 तक बढ़ा दी गई है। इस फैसले का कपड़ा उद्योग ने स्वागत किया है, लेकिन आम आदमी पार्टी (आप) के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने इसे किसानों के साथ “विश्वासघात” करार देते हुए केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है।

सरकार का तर्क और फैसले की वजह

वित्त मंत्रालय ने 18 अगस्त को जारी अधिसूचना में कहा कि यह कदम कपड़ा उद्योग को राहत देने और त्योहारी सीजन में कपास आधारित उत्पादों जैसे कपड़े, रजाई और गद्दों की कीमतें स्थिर रखने के लिए उठाया गया है। सरकार का दावा है कि हाल के वर्षों में कपास उत्पादन में कमी (2023-24 में 323.11 लाख गांठ) और कीट-रोग, विपरीत मौसम जैसी समस्याओं के कारण यह फैसला जरूरी था। भारतीय कपड़ा उद्योग परिसंघ (सीआईटीआई) ने इसे अस्थायी राहत बताते हुए स्वागत किया, क्योंकि इससे उद्योग को सस्ता कच्चा माल मिलेगा और अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा बनी रहेगी।

अरविंद केजरीवाल का विरोध

आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने इस फैसले को किसानों के हितों पर कुठाराघात बताया। उन्होंने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस और एक्स पोस्ट्स में कहा, “मोदी सरकार ने चोरी-छिपे अमेरिकी कपास पर 11% आयात शुल्क हटाकर किसानों को गहरे संकट में डाल दिया है। जब तक भारतीय किसानों की कपास अक्टूबर में मंडी में पहुंचेगी, तब तक व्यापारी सस्ती अमेरिकी कपास खरीद लेंगे। इससे किसानों को औने-पौने दाम पर फसल बेचनी पड़ेगी।” केजरीवाल ने इसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दबाव में लिया गया फैसला करार दिया और सुझाव दिया कि भारत को भी अमेरिकी माल पर दोगुना टैरिफ लगाकर जवाब देना चाहिए।

उन्होंने गुजरात के सुरेंद्रनगर के चोटिला में 7 सितंबर को आयोजित जनसभा का जिक्र करते हुए कहा कि यह क्षेत्र देश में सबसे ज्यादा कपास उत्पादन करता है, और वहां किसान इस फैसले के खिलाफ एकजुट हो रहे हैं।

किसानों और विपक्ष की चिंता

किसान संगठनों और विपक्षी दलों ने इस फैसले को किसान विरोधी बताया। उनका कहना है कि सस्ती अमेरिकी कपास से भारतीय किसानों की उपज की कीमतें 15-20% तक गिर सकती हैं, जिससे उन्हें आर्थिक नुकसान होगा। विपक्षी नेताओं ने यह भी आरोप लगाया कि अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर 50% टैरिफ लगाने के बावजूद केंद्र सरकार ने यह कदम उठाकर “घुटने टेक दिए हैं,” जो 140 करोड़ भारतीयों के सम्मान पर प्रहार है।

कपास उत्पादन और खपत का आंकड़ा

भारत दुनिया का सबसे बड़ा कपास उत्पादक देश है, जो वैश्विक उत्पादन का 25% हिस्सा पैदा करता है। 2024-25 के लिए अनुमानित उत्पादन 2.95 करोड़ गांठ (लगभग 50.15 लाख टन) है, जबकि खपत 3.2 करोड़ गांठ के आसपास है। इस अंतर को पूरा करने के लिए आयात जरूरी है। अमेरिका से कपास आयात 2025 के पहले छह महीनों में 109% बढ़कर 181.46 मिलियन डॉलर हो गया।

उद्योग बनाम किसान

कपड़ा उद्योग का कहना है कि ड्यूटी हटने से उन्हें सस्ता कच्चा माल मिलेगा, जिससे अमेरिका में निर्यात बढ़ेगा, जो भारत का सबसे बड़ा कपड़ा निर्यात बाजार है (6 अरब डॉलर)। लेकिन किसानों का तर्क है कि उनकी फसल तैयार होने से पहले सस्ती अमेरिकी कपास बाजार में छा जाएगी, जिससे उनकी आय प्रभावित होगी।

आगे की राह

केजरीवाल ने केंद्र से मांग की है कि ड्यूटी फिर से लागू की जाए ताकि किसानों को आत्महत्या जैसे कदमों से बचाया जा सके। दूसरी ओर, सरकार का कहना है कि यह अस्थायी कदम उद्योग और उपभोक्ताओं के हित में है। इस मुद्दे पर गुजरात, महाराष्ट्र जैसे कपास उत्पादक राज्यों में विरोध तेज हो सकता है।

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