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भारत ने वर्ष 2030 तक अंतरिक्ष को ‘डेब्रिस फ्री’ बनाने का लक्ष्य किया घोषित, इसरो और स्टार्टअप्स मिलकर जुटाएंगे तकनीक

भारत ने वर्ष 2030 तक अंतरिक्ष को ‘डेब्रिस फ्री’ बनाने का लक्ष्य किया घोषित, इसरो और स्टार्टअप्स मिलकर जुटाएंगे तकनीक

​नई दिल्ली:

​पृथ्वी की कक्षा में तेजी से बढ़ते अंतरिक्ष मलबे को देखते हुए भारत ने वर्ष 2030 तक अपनी अंतरिक्ष गतिविधियों को पूरी तरह “डेब्रिस फ्री” (मलबा मुक्त) बनाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य घोषित किया है। केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने ‘स्वच्छ स्पेस’ विजन की घोषणा करते हुए कहा कि भारत अंतरिक्ष मलबा हटाने की तकनीक विकसित करने वाले अग्रणी देशों में शामिल हो रहा है। इस पहल का उद्देश्य अंतरिक्ष को सुरक्षित, टिकाऊ और भविष्य की वैज्ञानिक गतिविधियों के अनुकूल बनाए रखना है, क्योंकि वर्तमान में अंतरिक्ष में 10 करोड़ से अधिक मानव निर्मित मलबे के टुकड़े मौजूद हैं।

​केंद्र सरकार के ‘डेब्रिस फ्री स्पेस मिशन’ (DFSM) के तहत यह तय किया गया है कि 2030 तक भारतीय अंतरिक्ष गतिविधियों से नया अंतरिक्ष मलबा पैदा नहीं होने दिया जाएगा। इस मिशन में सरकारी एजेंसियों के साथ निजी अंतरिक्ष कंपनियां भी मिलकर काम करेंगी। अमेरिकी स्पेस सर्विलांस नेटवर्क के आंकड़ों के अनुसार, पृथ्वी की कक्षा में 34 हजार से अधिक बड़ी वस्तुएं और लगभग 10 करोड़ छोटे मलबे के टुकड़े मौजूद हैं, जो 25 हजार किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक की गति से यात्रा करते हैं। वैश्विक मलबे में अमेरिका और रूस की हिस्सेदारी 70 से 80 प्रतिशत है, जबकि भारत का योगदान 1 प्रतिशत से भी कम है। इसके बावजूद भारत अंतरिक्ष सुरक्षा को लेकर बेहद गंभीर है।

​इस दिशा में इसरो (ISRO) पहले से ही उपग्रहों के डिजाइन में ही मिशन के बाद उन्हें सुरक्षित कक्षा से हटाने का प्रावधान कर रहा है। इसके अलावा, भारत का ‘नेत्रा’ (NETRA) कार्यक्रम और ‘इसॉम’ (IS4OM) अंतरिक्ष निगरानी और टकराव के जोखिम का आकलन करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। निजी क्षेत्र की भागीदारी के तहत हैदराबाद की स्टार्टअप ‘कॉस्मोसर्व स्पेस’ अंतरिक्ष कचरा हटाने, सैटेलाइट सर्विसिंग और ड्यूल स्पेसक्राफ्ट आर्किटेक्चर जैसी भविष्य की तकनीक विकसित कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि उपग्रह सर्विसिंग और अंतरिक्ष मलबा हटाने का वैश्विक बाजार 2030 तक 14.5 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है।

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