शरद पवार की राजनीति और NCP के संभावित सियासी समीकरण: एक विश्लेषणात्मक नजरिया
शरद पवार की राजनीति और NCP के संभावित सियासी समीकरण: एक विश्लेषणात्मक नजरिया
मुंबई:
महाराष्ट्र की राजनीति के ‘चाणक्य’ कहे जाने वाले राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP – शरदचंद्र पवार) प्रमुख शरद पवार की अस्पताल के बिस्तर से चल रही राजनीतिक गतिविधियां राज्य के सियासी गलियारों में चर्चा का सबसे बड़ा केंद्र बनी हुई हैं। मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में छाती के संक्रमण का इलाज करा रहे शरद पवार से प्रफुल्ल पटेल की मुलाकात और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हाल ही में ली गई उनकी सेहत की सुध ने इन अटकलों को और तेज कर दिया है कि क्या एनसीपी के दोनों धड़े फिर से एक हो सकते हैं या शरद पवार का गुट एनडीए (NDA) के करीब जा रहा है।
पवार की राजनीति का केंद्र बिंदु: सत्ता और व्यावहारिकता
पिछले छह दशकों के अपने लंबे राजनीतिक सफर में शरद पवार ने हमेशा वैचारिक कठोरता के बजाय राजनीतिक यथार्थवाद और परिस्थितियों के अनुकूल फैसले लेने की क्षमता का परिचय दिया है। उनके आलोचक और प्रशंसक दोनों इस बात से सहमत हैं कि उनके अगले कदम का अनुमान लगाना बेहद कठिन होता है।
1999 का कांग्रेस से अलगाव और फिर गठबंधन: सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर कांग्रेस से अलग होकर एनसीपी बनाने वाले पवार ने चुनाव के तुरंत बाद राज्य में सत्ता संतुलन साधने के लिए उसी कांग्रेस के साथ गठबंधन कर सरकार बना ली थी।
2014 में बीजेपी को समर्थन: जब 2014 के विधानसभा चुनाव के बाद बीजेपी बहुमत से दूर थी, तब शरद पवार ने बिना मांगे बीजेपी को समर्थन देने की घोषणा कर सबको चौंका दिया था, ताकि राज्य में राजनीतिक स्थिरता बनी रहे।
2019 में महाविकास अघाड़ी (MVA) का गठन: तीसरे नंबर की पार्टी होने के बावजूद उन्होंने धुर विरोधी विचारधारा वाली शिवसेना के साथ मिलकर एमवीए सरकार की पटकथा लिखी, जो उनके राजनीतिक कौशल का सबसे बड़ा उदाहरण है।
वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियां और विलय की अटकलें
अजित पवार के निधन के बाद उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार और पार्थ पवार के हाथों में पार्टी की कमान आने के बाद एनसीपी (अजित गुट) के भीतर सांगठनिक चुनौतियों और असंतोष की खबरें सामने आती रही हैं। दूसरी ओर, लोकसभा और विधानसभा चुनावों के बाद शरद पवार का गुट भी अपनी राजनीतिक जमीन को मजबूत करने के विकल्पों पर विचार कर रहा है।
पवार ने पहले भी एक इंटरव्यू में संकेत दिए थे कि पार्टी के कुछ नेता दोनों गुटों के पुनर्मिलन के पक्ष में हैं, हालांकि इस पर अंतिम निर्णय अगली पीढ़ी, विशेषकर सुप्रिया सुले को लेना है। इसके अलावा, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और अन्य मुद्दों पर कांग्रेस व शिवसेना (UBT) से अलग रुख अपनाने को केंद्र सरकार के प्रति उनके नरम रवैये के रूप में देखा जा रहा है।
MVA और INDIA गठबंधन पर क्या होगा असर?
यदि शरद पवार का गुट सुनेत्रा पवार के नेतृत्व वाले धड़े के साथ विलय की राह चुनता है या एनडीए के साथ किसी नए राजनीतिक समीकरण का हिस्सा बनता है, तो इसका दूरगामी असर देखने को मिल सकता है:
महाविकास अघाड़ी को झटका: महाराष्ट्र में MVA के मुख्य वास्तुकार और रणनीतिकार के रूप में शरद पवार की भूमिका केंद्रीय रही है। उनका अलग होना इस गठबंधन को कमजोर कर सकता है।
राष्ट्रीय विपक्ष पर प्रभाव: राष्ट्रीय स्तर पर ‘INDIA’ गठबंधन को आकार देने और एकजुट रखने में पवार का कद बहुत बड़ा है। ऐसे में उनके पाला बदलने से राष्ट्रीय विपक्ष की राजनीति का शक्ति संतुलन भी प्रभावित हो सकता है।
फिलहाल, अस्पताल के कमरे से शरद पवार क्या नया राजनीतिक दांव चलेंगे, इस पर राज्य के सभी राजनीतिक दलों की पैनी नजर टिकी हुई है।

