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कजरी तीज 2026: इस तारीख को मनाया जाएगा त्योहार, जानें शुभ मुहूर्त, चंद्रोदय समय और पूजा सामग्री

कजरी तीज 2026: इस तारीख को मनाया जाएगा त्योहार, जानें शुभ मुहूर्त, चंद्रोदय समय और पूजा सामग्री

नई दिल्ली: हिंदू पंचांग के अनुसार हर साल भाद्रपद कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को कजरी तीज का पर्व मनाया जाता है। इसे कज्जली तीज के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है। सुहागिन महिलाएं अखंड सौभाग्य की कामना के लिए व्रत रखती हैं और चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रत खोलती हैं।

कजरी तीज 2026 कब है?

पंचांग के अनुसार भाद्रपद कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि 30 अगस्त 2026 को सुबह 9:36 बजे शुरू होगी और 31 अगस्त को सुबह 8:50 बजे समाप्त होगी। उदयातिथि के अनुसार कजरी तीज का पर्व 31 अगस्त 2026, सोमवार को मनाया जाएगा।

कजरी तीज 2026 के शुभ मुहूर्त

ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4:51 बजे से 5:37 बजे तक

अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:14 बजे से 1:04 बजे तक

संध्या मुहूर्त: शाम 6:54 बजे से रात 8:03 बजे तक

कजरी तीज के दिन चौघड़िया

अमृत: सुबह 5:58 बजे से 7:34 बजे तक

शुभ: सुबह 9:10 बजे से 10:45 बजे तक

लाभ: दोपहर 3:33 बजे से शाम 5:08 बजे तक

अमृत: शाम 5:08 बजे से 6:44 बजे तक

सूर्यास्त: शाम 6:44 बजे

रात 8:25 बजे होगा चंद्रोदय

कजरी तीज के दिन चंद्रोदय रात 8:25 बजे होने का उल्लेख पंचांग में किया गया है। धार्मिक परंपरा के अनुसार चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रत का पारण किया जाता है। अर्घ्य के लिए जल में दूध, रोली और अक्षत मिलाकर चंद्र देव को अर्पित किया जाता है। इसके बाद व्रत कथा का पाठ किया जाता है।

कजरी तीज पूजा सामग्री

पूजा के लिए दीपक, घी, तेल, कपूर, अगरबत्ती, पीले वस्त्र, हल्दी, चंदन, श्रीफल, दूध, गंगाजल, दही, मिश्री, शहद, पंचामृत, कलश, सुपारी, जनेऊ, नारियल, बेलपत्र, शमी के पत्ते और दूर्वा आदि सामग्री रखी जाती है।

माता पार्वती के लिए परंपरा के अनुसार हरे रंग की साड़ी, चुनरी, बिंदी, चूड़ियां, कुमकुम, सिंदूर, मेहंदी और अन्य सुहाग सामग्री अर्पित की जाती है।

धार्मिक मान्यता

मान्यता है कि कजरी तीज का व्रत रखने से वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना पूरी होती है। वहीं, अविवाहित कन्याएं भी मनचाहे जीवनसाथी की कामना से यह व्रत रखती हैं।

डिस्क्लेमर: यह जानकारी धार्मिक मान्यताओं और पंचांग पर आधारित है। इन मान्यताओं का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। पूजा या व्रत से जुड़े किसी निर्णय के लिए स्थानीय पंचांग या विद्वान की सलाह ली जा सकती है।

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