Saturday, July 18, 2026
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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: सिर्फ गाली-गलौज या अभद्र भाषा IPC की धारा 294 के तहत ‘अश्लीलता’ नहीं, कोर्ट ने समझाया अंतर

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: सिर्फ गाली-गलौज या अभद्र भाषा IPC की धारा 294 के तहत ‘अश्लीलता’ नहीं, कोर्ट ने समझाया अंतर

​सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में साफ किया है कि सिर्फ गाली-गलौज, अपशब्द, अभद्र या अशिष्ट भाषा का इस्तेमाल करना भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 294 के तहत ‘अश्लीलता’ के दायरे में नहीं आता। न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने स्पष्ट किया कि कानून की नजर में ‘अश्लीलता’ (Obscenity) और ‘अभद्रता’ (Vulgarity) दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं।

​अदालत ने यह टिप्पणी तमिलनाडु के एक 70 वर्षीय बुजुर्ग की अपील पर सुनवाई के दौरान की। यह मामला साल 2017 में जमीन विवाद के दौरान हुए एक झगड़े से जुड़ा था, जिसमें आरोपी पर गाली देने, आपराधिक धमकी देने और बिलहुक (एक प्रकार का धारदार हथियार) से हमला करने का आरोप था।

​क्या था पूरा मामला?

​अभियोजन पक्ष के अनुसार, अगस्त 2017 में जमीन के विवाद को लेकर हुई एक तीखी बहस में अपीलकर्ता ने शिकायतकर्ता को सार्वजनिक रूप से अपशब्द कहे और उस पर जानलेवा हमला किया, जिससे शिकायतकर्ता की नाक की हड्डी टूट गई थी।

​निचली अदालत का फैसला: ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को आईपीसी और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (SC/ST) अधिनियम के तहत दोषी ठहराया था।

​हाईकोर्ट का रुख: मद्रास हाईकोर्ट ने आरोपी को SC/ST एक्ट के आरोपों से बरी कर दिया। हालांकि, हाईकोर्ट ने उसे धारा 294(बी) (सार्वजनिक स्थान पर अश्लील शब्द बोलना) और धारा 506(II) (आपराधिक धमकी) के आरोपों से भी बरी कर दिया, लेकिन धारा 326 (खतरनाक हथियार से गंभीर चोट पहुंचाना) के तहत दोषसिद्धि को बरकरार रखा।

​सजा में नरमी: आरोपी की ढलती उम्र, खराब स्वास्थ्य और पारिवारिक विवाद की प्रकृति को देखते हुए हाईकोर्ट ने उसकी जेल की सजा को ‘अदालत उठने तक की कैद’ में बदल दिया था और 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया था।

​सुप्रीम कोर्ट ने तय की ‘अश्लीलता’ की परिभाषा

​सर्वोच्च अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि महज किसी की भावनाएं आहत होना या भाषा का अशिष्ट होना कानूनन अश्लीलता नहीं है। धारा 294 को लागू करने के लिए अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होगा कि:

​इस्तेमाल किए गए शब्द कामुकता से भरे हों, जो यौन उत्तेजना या वासनात्मक रुचि पैदा करते हों।

​उन शब्दों में लोगों के नैतिक चरित्र को भ्रष्ट या विकृत करने की प्रवृत्ति हो।

​अदालत ने कहा: “अपराध को साबित करने के लिए दो बातें सिद्ध होनी जरूरी हैं— पहला, कथित अश्लील शब्द किसी सार्वजनिक स्थान या उसके आसपास बोले गए हों, और दूसरा, उन शब्दों से वहां मौजूद आम लोगों को वास्तविक रूप से परेशानी (Annoyance) हुई हो।” मौजूदा मामले में कोर्ट ने पाया कि ये दोनों शर्तें साबित नहीं हुईं।

​गुस्से में दी गई हर धमकी ‘आपराधिक धमकी’ नहीं

​अदालत ने धारा 506(II) (आपराधिक धमकी) को लेकर भी एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू साफ किया। पीठ ने कहा कि किसी झगड़े के दौरान गुस्से में मुंह से निकली धमकी मात्र से यह अपराध नहीं बनता। इस धारा के तहत दोषसिद्धि के लिए यह साबित होना अनिवार्य है कि धमकी का मुख्य उद्देश्य सामने वाले व्यक्ति के मन में गहरा भय पैदा करना था या उसे अपनी मर्जी के खिलाफ कोई काम करने या न करने के लिए मजबूर करना था। इस मामले में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिला।

​धारा 326 के तहत दोषसिद्धि सही

​हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि आरोपी ने धारदार बिलहुक से हमला कर शिकायतकर्ता की नाक की हड्डी तोड़ दी थी, जो मेडिकल और कानूनी मापदंडों के अनुसार एक ‘गंभीर चोट’ (Grievous Hurt) है। चूंकि मेडिकल रिपोर्ट और चश्मदीदों के बयान इस हमले की पुष्टि करते हैं, इसलिए शीर्ष अदालत ने धारा 326 के तहत बुजुर्ग की दोषसिद्धि और जुर्माने को पूरी तरह सही ठहराया।

​अदालत ने पूर्व के कई ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए दोहराया कि अश्लीलता का निर्धारण हमेशा समकालीन सामाजिक मानकों और उसके यौन या कामुक प्रभाव के आधार पर ही किया जाना चाहिए।

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