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महिलाओं को संसद में 33% आरक्षण कब मिलेगा? आज के बिल के पारित न होने का क्या है मतलब?

महिलाओं को संसद में 33% आरक्षण कब मिलेगा? आज के बिल के पारित न होने का क्या मतलब है?

लोकसभा में गिरा संविधान संशोधन बिल, दो-तिहाई बहुमत नहीं मिला

नई दिल्ली, 17 अप्रैल 2026: संसद के विशेष सत्र में आज महिला आरक्षण से जुड़े तीन महत्वपूर्ण विधेयकों पर लोकसभा में वोटिंग हुई, लेकिन सरकार को दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल पाया। संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 गिर गया। पक्ष में 298 वोट पड़े जबकि विरोध में 230 वोट। एनडीए के पास पर्याप्त संख्या बल नहीं था, जिससे बिल पास नहीं हो सका।

आज क्या हुआ?

सरकार ने 16-18 अप्रैल के विशेष सत्र में तीन बिल पेश किए:

संविधान (131वां संशोधन) बिल, 2026 — 2023 के महिला आरक्षण कानून को लागू करने के लिए संशोधन।

परिसीमन (Delimitation) बिल, 2026।

संघ राज्य क्षेत्र कानून संशोधन बिल।

उद्देश्य: लोकसभा की सीटें बढ़ाकर लगभग 815-850 करना और उनमें 33% महिलाओं के लिए आरक्षित करना, साथ ही राज्य विधानसभाओं में भी।

विपक्ष (कांग्रेस, सपा, तृणमूल आदि) ने परिसीमन पर आपत्ति जताई। दक्षिणी राज्यों (तमिलनाडु, केरल, आंध्र, कर्नाटक) को चिंता है कि 2011 जनगणना के आधार पर परिसीमन से उनकी सीटें कम हो सकती हैं।

बिल पेश होने के समय कुछ वोटिंग हुई (207-126 या 251-185), लेकिन अंतिम पास होने के लिए दो-तिहाई बहुमत (लोकसभा में लगभग 360 वोट) जरूरी था, जो नहीं मिला।

2023 का बिल क्या कहता था?

नारी शक्ति वंदन अधिनियम (106वां संशोधन, 2023) संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को एक-तिहाई (33%) आरक्षण देता है।

लेकिन यह लागू तभी होगा जब:

नई जनगणना (Census) पूरी हो।

उसके बाद परिसीमन (Delimitation) हो।

मूल अनुमान: 2031 जनगणना के बाद 2034 चुनावों से लागू हो सकता था।

सरकार अब 2026 के विशेष सत्र में 2011 जनगणना या “latest available data” के आधार पर परिसीमन कर 2029 चुनावों से आरक्षण लागू करने की कोशिश कर रही थी, लेकिन बिल पास नहीं हुआ।

आज के बिल के पारित न होने का मतलब क्या है?

आरक्षण अभी नहीं मिलेगा: महिलाओं को लोकसभा और विधानसभाओं में 33% सीटें 2029 चुनावों में भी नहीं मिल पाएंगी (जब तक नया समझौता या दोबारा कोशिश न हो)।

प्रक्रिया में और देरी: बिल गिरने से 2023 का कानून अपनी मूल शर्तों (नई जनगणना + परिसीमन) पर ही अटका रहेगा। 2026-27 जनगणना चल रही है, परिसीमन में 2-3 साल लग सकते हैं। आरक्षण 2034 या उसके बाद लागू होने की संभावना बढ़ गई।

राजनीतिक गतिरोध: विपक्ष ने इसे “महिलाओं के नाम पर दक्षिणी राज्यों के साथ अन्याय” बताया। परिसीमन से उत्तरी राज्यों (यूपी, बिहार आदि) की सीटें बढ़ने का डर दक्षिणी दलों को है।

लोकसभा सीटों का विस्तार: सीटें बढ़ाने (543 से 850 तक) का प्रस्ताव भी अटक गया।

महिलाओं के लिए निराशा: 30 साल की लड़ाई के बाद भी ठोस आरक्षण दूर दिख रहा है। कई महिला सांसदों और संगठनों ने निराशा जताई।

आगे क्या हो सकता है?

सरकार बैक-चैनल बातचीत कर विपक्षी दलों (जैसे सपा, TMC, DMK) से समर्थन या abstention (मतदान से दूर रहने) की कोशिश कर सकती है।

विशेष सत्र जारी है (18 अप्रैल तक) — अगर दोबारा वोटिंग हुई और संख्या जुट गई तो बिल पास हो सकता है।

अगर नहीं हुआ तो 2023 का कानून अपनी गति से चलेगा, यानी जनगणना 2026-27 के बाद परिसीमन के बाद ही आरक्षण।

विशेषज्ञों का कहना है कि बिना सहमति के परिसीमन दक्षिण-उत्तर विभाजन को बढ़ा सकता है।

निष्कर्ष: आज का वोट महिलाओं के लिए बड़ा झटका है। आरक्षण की राह अभी लंबी है। यह सिर्फ महिलाओं का मुद्दा नहीं, बल्कि जनगणना, परिसीमन और संघीय संतुलन का भी मुद्दा बन गया है। सरकार और विपक्ष दोनों को समझौता करना होगा, वरना महिलाओं का इंतजार और लंबा खिंच सकता है।

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