असम चुनाव 2026: जुबानी जंग या मर्यादा का चीरहरण? निजी हमलों से गरमाया सियासी पारा
असम विधानसभा चुनाव 2026 के मुहाने पर खड़ा है और राज्य की राजनीति में ‘जुबानी जंग’ अब ‘मर्यादा’ की सीमाओं को लांघती नजर आ रही है। पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का स्तर व्यक्तिगत हमलों और अपमानजनक टिप्पणियों तक पहुंच गया है।
असम चुनाव 2026: जुबानी जंग या मर्यादा का चीरहरण? निजी हमलों से गरमाया सियासी पारा
असम में विधानसभा चुनावों की तारीखें नजदीक आते ही राजनीतिक विमर्श (Political Discourse) का स्तर गिरता जा रहा है। विकास और मुद्दों की बात अब हाशिए पर है और उसकी जगह ‘निजी हमलों’, ‘अपमानजनक उपनामों’ और ‘गंभीर आरोपों’ ने ले ली है। राज्य के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा और कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के बीच चल रही तल्खी ने लोकतंत्र की मर्यादा पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
विवाद की मुख्य जड़ें: ‘पागल’ से लेकर ‘पेड़ा’ तक
हालिया विवाद तब और गहरा गया जब मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे पर तीखा हमला बोला।
खड़गे पर टिप्पणी: सीएम सरमा ने खड़गे की उम्र का हवाला देते हुए उन्हें ‘पागल’ तक कह डाला। इस बयान के बाद कांग्रेस ने कड़ा विरोध दर्ज कराते हुए इसे दलित समुदाय का अपमान बताया है। प्रियंका गांधी ने सोशल मीडिया पर इस टिप्पणी को “अश्लील और अपमानजनक” करार देते हुए प्रधानमंत्री मोदी से स्पष्टीकरण मांगा है।
पवन खेड़ा बनाम ‘पवन पेड़ा’: सीएम ने कांग्रेस नेता पवन खेड़ा के खिलाफ भी तंज कसा। उन्होंने एक जनसभा में कहा कि वे “पवन खेड़ा को पवन पेड़ा बना देंगे”। यह विवाद पवन खेड़ा द्वारा मुख्यमंत्री की पत्नी रिनिकी भुइयां सरमा पर लगाए गए भ्रष्टाचार और ‘मल्टीपल पासपोर्ट’ के आरोपों के बाद शुरू हुआ।
भ्रष्टाचार और ‘पाकिस्तानी कनेक्शन’ के आरोप
असम की राजनीति इस समय परिवार और संपत्ति के इर्द-गिर्द सिमट गई है:
विपक्ष का वार: गौरव गोगोई और पवन खेड़ा ने आरोप लगाया है कि मुख्यमंत्री की पत्नी के पास यूएई और अन्य देशों के पासपोर्ट हैं और उन्होंने चुनावी हलफनामे में संपत्ति की जानकारी छिपाई है।
सत्ता पक्ष का पलटवार: हिमंता बिस्वा सरमा ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि कांग्रेस ‘पाकिस्तानी सोशल मीडिया ग्रुप्स’ से जानकारी चुराकर उन्हें बदनाम कर रही है। उन्होंने गौरव गोगोई की पत्नी के ‘विदेशी कनेक्शन’ और कथित रूप से ‘ISI से जुड़े लोगों’ के साथ काम करने के आरोप भी लगाए।
मुद्दे जो पीछे छूट गए
एक तरफ जहां नेता एक-दूसरे के चरित्र हनन में जुटे हैं, वहीं जनता के असल मुद्दे शोर में दब गए हैं:
बेरोजगारी: हालिया सर्वे के अनुसार असम के युवाओं के लिए बेरोजगारी सबसे बड़ा मुद्दा है।
महंगाई और बाढ़: हर साल आने वाली बाढ़ की समस्या और बढ़ती कीमतों पर चर्चा नगण्य है।
जनसांख्यिकीय बदलाव: भाजपा जहां ‘घुसपैठ’ और ‘स्वदेशी पहचान’ को ढाल बना रही है, वहीं विपक्ष इसे ध्रुवीकरण की राजनीति बता रहा है।
निष्कर्ष: असम का यह चुनाव अब केवल सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि व्यक्तिगत रंजिशों का अखाड़ा बन चुका है। ‘मर्यादा का चीरहरण’ करने वाली यह शब्दावली मतदाताओं को लुभाती है या उनसे दूर ले जाती है, इसका फैसला चुनाव परिणाम ही करेंगे।
नोट: चुनाव आयोग ने दोनों पक्षों को अपनी भाषा पर संयम रखने की चेतावनी दी है, लेकिन मैदान में उतरने के बाद नेताओं के सुर और भी तीखे होते जा रहे हैं।
