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धुरंधर का महा-मुकाबला: आखिर क्यों रहमान डकैत पड़ा मेजर इकबाल पर भारी?

आदित्य धर की फिल्म ‘धुरंधर’ (Dhurandhar) के रिलीज होने के बाद सोशल मीडिया और सिनेमाई गलियारों में एक ही बहस छिड़ी है—विलेन कौन ज्यादा दमदार था? एक तरफ पहले पार्ट का खूंखार गैंगस्टर रहमान डकैत (अक्षय खन्ना) और दूसरी तरफ दूसरे पार्ट का मास्टरमाइंड मेजर इकबाल (अर्जुन रामपाल)।

हैरानी की बात यह है कि जहां रहमान डकैत के नाम से ही लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते थे, वहीं मेजर इकबाल का किरदार दर्शकों को थोड़ा ‘फीका’ लग रहा है। आइए विस्तार से समझते हैं इस ‘भौकाल’ और ‘कमी’ के पीछे का असली खेल।

धुरंधर का महा-मुकाबला: आखिर क्यों रहमान डकैत पड़ा मेजर इकबाल पर भारी?

1. रहमान डकैत: खौफ का वह चेहरा जिसे भुलाया नहीं जा सकता

अक्षय खन्ना ने रहमान डकैत के किरदार में जो जान फूंकी, वह सिनेमाई इतिहास के सबसे खतरनाक खलनायकों में गिना जाने लगा है। इसके ‘भौकाली’ होने के तीन मुख्य कारण थे:

* अनप्रेडिक्टेबिलिटी (अनिश्चितता): रहमान कब हंसेगा और कब सामने वाले का गला काट देगा, इसका अंदाजा लगाना नामुमकिन था। उसने 13 साल की उम्र में पहली हत्या की और अपनी मां तक को नहीं बख्शा। यह ‘डार्क बैकस्टोरी’ उसे बेहद डरावना बनाती है।

* अक्षय खन्ना की स्क्रीन प्रेजेंस: अक्षय ने अपनी आंखों और लहजे से एक ऐसा आतंक पैदा किया कि हीरो (रणवीर सिंह) के सामने भी दर्शक विलेन के लिए तालियां बजाने को मजबूर हो गए।

* जमीनी पकड़: रहमान कोई सूट-बूट वाला विलेन नहीं था; वह लियारी की गलियों का वह ‘मसीहा’ और ‘शैतान’ था जिसकी इजाजत के बिना वहां पत्ता भी नहीं हिलता था।

2. मेजर इकबाल: ‘एन्जिल ऑफ डेथ’ जो उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा

अर्जुन रामपाल का किरदार मेजर इकबाल (इलियास कश्मीरी से प्रेरित) तकनीकी रूप से रहमान से कहीं ज्यादा पावरफुल है। वह एक ISI ऑपरेटिव है, ग्लोबल आतंकी नेटवर्क चलाता है, लेकिन फिर भी वह दर्शकों के दिल (या डर) में जगह नहीं बना पाया।

* ज्यादा संवाद, कम असर: फिल्म के दूसरे भाग में मेजर इकबाल के किरदार को बहुत ज्यादा ‘Backstory’ और संवादों के बोझ तले दबा दिया गया। जहां रहमान की चुप्पी डराती थी, वहीं इकबाल की बातें कभी-कभी लंबी लगने लगीं।

* कमजोरी का दिखना: सीक्वल में इकबाल को अपने पिता से अपमानित होते और पारिवारिक उलझनों में फंसा दिखाया गया। एक विलेन जब ‘कमजोर’ या ‘बेचारा’ दिखने लगता है, तो उसका ‘भौकाल’ अपने आप कम हो जाता है।

* आसान अंत: प्रशंसकों का मानना है कि जिस मेजर इकबाल ने फिल्म की शुरुआत में भारतीय सैनिकों को ‘फिश हुक्स’ से टॉर्चर किया था, उसे मारना नायक के लिए बहुत आसान बना दिया गया।

तुलनात्मक विश्लेषण: एक नज़र में

| विशेषता | रहमान डकैत (अक्षय खन्ना) | मेजर इकबाल (अर्जुन रामपाल) |

| प्रेरणा | अब्दुल रहमान बलोच (गैंगस्टर) | इलियास कश्मीरी (आतंकी) |

| ताकत | स्ट्रीट पावर और क्रूरता | मिलिट्री ट्रेनिंग और ग्लोबल नेटवर्क |

| यूनीक पॉइंट | मां का हत्यारा, अनप्रेडिक्टेबल व्यवहार | ‘हजार घाव’ (Bleed India) की रणनीति |

| कमी | फिल्म में स्क्रीन टाइम कम था | इमोशनल बैकस्टोरी ने ‘डर’ कम कर दिया |

निष्कर्ष: स्क्रीन राइटिंग का अंतर

मेजर इकबाल एक ‘सिस्टम’ का हिस्सा है, जबकि रहमान डकैत खुद एक ‘सिस्टम’ था। दर्शकों को वह विलेन ज्यादा पसंद आता है जो नियमों को तोड़ता है, न कि वह जो नियमों (या बॉलीवुडी इमोशन्स) में बंधा हो।

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