अन्तर्राष्ट्रीय

ईरान-इजरायल ‘ऑयल वॉर’: गहराता वैश्विक ऊर्जा संकट, आसमान छूती कीमतें और दुनिया पर मंडराता आर्थिक खतरा

ईरान और इजरायल के बीच छिड़ा संघर्ष अब महज एक सैन्य टकराव नहीं रह गया है, बल्कि यह एक ‘ग्लोबल ऑयल वॉर’ का रूप ले चुका है। चूंकि खाड़ी देश दुनिया के तेल उत्पादन का केंद्र हैं, इसलिए इस युद्ध की तपिश पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था महसूस कर रही है।

यहाँ इस ‘ऑयल वॉर’ के प्रमुख असर और प्रभावित क्षेत्रों का विस्तृत विवरण है:

1. कच्चे तेल की कीमतों में ‘आग’ (Brent Crude Surge)

युद्ध शुरू होने के बाद से कच्चे तेल (Brent Crude) की कीमतों में भारी उछाल आया है।

* ताजा स्थिति: मार्च के पहले सप्ताह में तेल की कीमतें $80-$82 प्रति बैरल थीं, जो अब कई क्षेत्रों में $100 से $110 के पार पहुंच गई हैं।

* अनुमान: यदि तनाव कम नहीं हुआ, तो विश्लेषकों का मानना है कि तेल $130 प्रति बैरल तक जा सकता है।

2. होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) का संकट

ईरान ने दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ को प्रभावी रूप से बंद करने की धमकी दी है।

* क्यों है महत्वपूर्ण? दुनिया का लगभग 20% तेल और भारी मात्रा में LNG (लिक्विड नेचुरल गैस) इसी रास्ते से गुजरता है।

* असर: इस रास्ते के बंद होने से सऊदी अरब, इराक, कुवैत और यूएई से होने वाली तेल सप्लाई पूरी तरह ठप हो सकती है।

3. भारत पर सीधा असर: जेब पर भारी बोझ

भारत अपनी जरूरत का 85% कच्चा तेल आयात करता है, जिसका बड़ा हिस्सा मिडिल ईस्ट से आता है।

* महंगाई: पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी से ट्रांसपोर्टेशन महंगा होगा, जिससे सब्जी से लेकर अनाज तक सब महंगा हो सकता है।

* रुपये में गिरावट: तेल के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ रहे हैं, जिससे भारतीय रुपया 92 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर तक गिर गया है।

* महंगे हवाई सफर: जेट फ्यूल (ATF) महंगा होने से घरेलू और अंतरराष्ट्रीय फ्लाइट्स के टिकटों के दाम 20-30% बढ़ गए हैं।

4. वैश्विक शेयर बाजार और मंदी का खतरा

* शेयर बाजार में गिरावट: वैश्विक शेयर बाजारों (Dow Jones, S&P 500) समेत भारतीय शेयर बाजार (Sensex/Nifty) में भारी बिकवाली देखी जा रही है। बैंकिंग और एविएशन सेक्टर सबसे ज्यादा प्रभावित हैं।

* मंदी की आशंका: ऊर्जा की ऊंची कीमतों के कारण वैश्विक महंगाई (Inflation) बढ़ रही है, जिससे 1970 के दशक जैसी आर्थिक मंदी का खतरा पैदा हो गया है।

5. सप्लाई चेन और मैन्युफैक्चरिंग

* शिपिंग कॉस्ट: मालवाहक जहाजों को अब लंबा रास्ता तय करना पड़ रहा है, जिससे शिपिंग की लागत और समय दोनों बढ़ गए हैं।

* कच्चा माल: एल्युमिनियम, फर्टिलाइजर और शुगर जैसी कमोडिटीज की सप्लाई प्रभावित होने से कंस्ट्रक्शन और खेती की लागत बढ़ रही है।

निष्कर्ष: आगे क्या?

युद्ध का अगला चरण इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या ईरान पड़ोसी अरब देशों (सऊदी, यूएई) के तेल ठिकानों को निशाना बनाता है या नहीं। यदि ऐसा होता है, तो वैश्विक ऊर्जा संकट गहरा सकता है।

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