राष्ट्रीय

13 साल की पीड़ा के बाद विदाई, लेकिन हरीश राणा जाते-जाते देंगे कई जिंदगियां – अंगदान की मिसाल!

हरीश राणा की विदाई ने इंसानियत की मिसाल कायम की! 13 साल के कोमा के बाद इच्छामृत्यु, लेकिन जाते-जाते 5-7 लोगों को देंगे नई जिंदगी – परिवार का अंगदान फैसला दिल छू गया

गाजियाबाद के 32 वर्षीय हरीश राणा की कहानी 13 साल की पीड़ा और आखिरकार सम्मानजनक विदाई की है। 2013 में चंडीगढ़ में चौथी मंजिल से गिरने के बाद गंभीर ब्रेन इंजरी से वे स्थायी वेजिटेटिव स्टेट में चले गए थे। पिछले 13 सालों से परिवार ने दिन-रात उनकी देखभाल की, लेकिन डॉक्टरों ने बार-बार कहा कि रिकवरी की कोई संभावना नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2026 को ऐतिहासिक फैसला सुनाया – भारत में पहला कोर्ट-अप्रूव्ड पैसिव इच्छामृत्यु (passive euthanasia) का केस, जहां लाइफ सपोर्ट (फीडिंग ट्यूब आदि) हटाने की अनुमति मिली। 15 मार्च को परिवार ने भावुक विदाई दी – मां-बहन ने आंसुओं में कहा, “सबको माफ करो, सबसे माफी मांगो और जाओ…”। फिर उन्हें AIIMS दिल्ली लाया गया, जहां प्रक्रिया शुरू हुई।

लेकिन सबसे दिल छू लेने वाला हिस्सा – हरीश के माता-पिता ने फैसला किया कि उनके काम करने वाले अंगों का अंगदान किया जाएगा। मेडिकल एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अगर अंग viable पाए गए तो लिवर, किडनी, लंग्स, कॉर्निया आदि से 5 से 7 लोगों को नई जिंदगी मिल सकती है। परिवार ने कहा, “हमारा बेटा जा रहा है, लेकिन उसकी मौत किसी के लिए नई शुरुआत बनेगी।”

यह फैसला सिर्फ इच्छामृत्यु का नहीं, बल्कि अंगदान की भावना का भी प्रतीक बन गया है। सोशल मीडिया पर लोग लिख रहे हैं – “दुनिया से जाते हुए भी अमर हो गए हरीश!” यह केस भारत में एंड-ऑफ-लाइफ केयर, डिग्निटी इन डेथ और ऑर्गन डोनेशन पर नई बहस छेड़ रहा है।

हरीश राणा की याद में – एक जीवन की आखिरी सांस ने कई सांसों को बचाने का रास्ता दिखाया। क्या आप भी अंगदान के बारे में सोच रहे हैं? यह छोटा सा फैसला किसी की पूरी जिंदगी बदल सकता है।

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