SC/ST आरक्षण में क्रीमी लेयर की मांग: सुप्रीम कोर्ट में उठीं ये मुख्य दलीलें
सुप्रीम कोर्ट में SC/ST आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ (अमीर और सामाजिक रूप से आगे बढ़ चुके वर्ग) को बाहर करने की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई जारी है। ये मुद्दा 1 अगस्त 2024 के ऐतिहासिक फैसले (State of Punjab vs Davinder Singh) से जुड़ा है, जहां 7 जजों की बेंच ने SC/ST में सब-क्लासिफिकेशन (उप-वर्गीकरण) को मंजूरी दी थी। उसी फैसले में जस्टिस बी.आर. गवई (और कुछ अन्य जजों) ने क्रीमी लेयर पर टिप्पणी की थी, जिसके बाद कई याचिकाएं दाखिल हुईं।
मुख्य याचिकाएं और सुनवाई का अपडेट (जनवरी 2026 तक)
जनवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका (संतोष मालवीया द्वारा) पर कहा कि क्रीमी लेयर को बाहर करने का फैसला विधायिका और कार्यपालिका (सरकार और संसद) का है, कोर्ट सीधे निर्देश नहीं दे सकता।
अगस्त 2025 में रामाशंकर प्रजापति की याचिका पर कोर्ट ने केंद्र को नोटिस जारी किया और 10 अक्टूबर 2025 को सुनवाई तय की।
जनवरी 2026 में कोर्ट ने केंद्र, सभी राज्यों और UTs को नोटिस जारी किया, 4 हफ्ते में जवाब मांगा। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि आरक्षण का लाभ ज्यादातर अमीर और प्रभावशाली SC/ST को मिल रहा है, जबकि गरीब पीछे रह जाते हैं।
याचिकाकर्ताओं और समर्थकों की मुख्य दलीलें
असमान वितरण: आरक्षण का फायदा बार-बार एक ही परिवार/समूह को मिल रहा है, जबकि सबसे गरीब और पिछड़े SC/ST अभी भी गरीबी और भेदभाव में फंसे हैं। पिछले 75 सालों के अनुभव से साफ है कि कुछ लोग आरक्षण से आगे बढ़ चुके हैं और अब प्रतिस्पर्धा में बराबर हैं।
सच्ची समानता: जस्टिस गवई के 2024 फैसले का हवाला — “क्रीमी लेयर को बाहर करने से ही असली समानता आएगी, जैसा संविधान में है।” ओबीसी में लागू क्रीमी लेयर SC/ST पर भी होना चाहिए, लेकिन SC/ST के लिए अलग (सामाजिक पिछड़ापन ज्यादा महत्वपूर्ण)।
जस्टिस विक्रम नाथ और अन्य की सहमति: क्रीमी लेयर सिद्धांत SC/ST पर लागू होना चाहिए, ताकि लाभ जरूरतमंदों तक पहुंचे। अगर एक पीढ़ी आरक्षण से आगे बढ़ गई, तो अगली पीढ़ी को नहीं मिलना चाहिए।
नीति बनाने की जरूरत: राज्य सरकारों को डेटा के आधार पर क्रीमी लेयर की पहचान करने वाली पॉलिसी बनानी चाहिए। बिना इसके आरक्षण का उद्देश्य पूरा नहीं होता।
विरोधी दलीलें और केंद्र का रुख
केंद्र सरकार ने 2024 में साफ कहा: संविधान में SC/ST आरक्षण में क्रीमी लेयर का कोई प्रावधान नहीं है (बी.आर. आंबेडकर द्वारा दिया गया संविधान)। PM मोदी ने BJP SC/ST सांसदों को आश्वासन दिया कि ऐसा कोई कदम नहीं उठेगा।
कई संगठन (जैसे दलित नेता) कहते हैं कि SC/ST की पिछड़ापन सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और ऐतिहासिक भेदभाव से है, इसलिए क्रीमी लेयर लागू करना गलत होगा।
इंदिरा साहनी केस (1992) में कहा गया था कि SC/ST पर क्रीमी लेयर लागू नहीं होता, क्योंकि उनकी पिछड़ापन गहरी है।
क्या होगा आगे?
कोर्ट ने कहा है कि ये पॉलिसी मामला है — सरकार और विधायिका फैसला लें। लेकिन याचिकाओं पर नोटिस जारी होने से बहस तेज है।
अगर लागू हुआ तो SC/ST में अमीर वर्ग (जैसे IAS/IPS अधिकारी के बच्चे) आरक्षण से बाहर हो सकते हैं, और लाभ सबसे गरीब तक पहुंचेगा। लेकिन फिलहाल केंद्र विरोध में है।
ये मुद्दा संवेदनशील है और 2027 चुनावों से पहले राजनीतिक बहस का केंद्र बन सकता है। आप क्या सोचते हैं — SC/ST में क्रीमी लेयर लागू होना चाहिए या नहीं? कमेंट में बताएं!
