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92 साल में फिर राष्ट्रपति बने पॉल बिया, 43 साल से कैमरून पर कायम ‘शासन’… जानिए दुनिया के सबसे बुजुर्ग नेता को

दुनिया के सबसे उम्रदराज राष्ट्राध्यक्ष, कैमरून के प्रेसिडेंट पॉल बिया ने एक बार फिर इतिहास रच दिया। 92 साल की उम्र में उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव जीत लिया है, जिससे उनकी सत्ता अब आठवें कार्यकाल में प्रवेश कर गई। संवैधानिक परिषद ने सोमवार को आधिकारिक नतीजे घोषित करते हुए बताया कि बिया को 53.66 प्रतिशत वोट मिले, जबकि उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी और पूर्व सहयोगी इसा त्चिरोमा बकारी को 35.19 प्रतिशत। मतदान 12 अक्टूबर को हुआ था, और वोटर टर्नआउट 57.7 प्रतिशत रहा। यह जीत बिया को दुनिया का सबसे लंबे समय तक सत्ता में बने रहने वाले नेता बना रही है, जिन्होंने 1982 से कैमरून पर ‘कब्जा’ जमाए हुए हैं—कुल 43 साल।

पॉल बिया कौन हैं? एक नजर में

पॉल बिया का जन्म 13 फरवरी 1933 को कैमरून के दक्षिणी प्रांत में हुआ था। वे फ्रांस में पढ़ाई करने के बाद 1975 में कैमरून के प्रधानमंत्री बने। 1982 में राष्ट्रपति अहमदू अहिद्जो के इस्तीफे के बाद वे सत्ता में आए। तब से वे कभी हारे नहीं—1984 और 1988 में बिना विरोध के चुने गए, और उसके बाद बहुदलीय व्यवस्था के बावजूद हर चुनाव में भारी बहुमत से जीते। 2008 में उन्होंने संवैधानिक बदलाव कर टर्म लिमिट हटा ली, जिससे अनिश्चितकाल तक सत्ता में बने रहने का रास्ता साफ हो गया। गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के अनुसार, वे दुनिया के सबसे बुजुर्ग राष्ट्राध्यक्ष हैं, और 18 फरवरी 2025 को उनकी उम्र 92 साल 5 दिन थी।

बिया को ‘द इमॉर्टल’ (अमर) कहा जाता है। वे लंबे समय तक सार्वजनिक दृष्टि से गायब रहते हैं—पिछले साल छह हफ्ते तक उनकी अनुपस्थिति ने स्वास्थ्य संबंधी अफवाहें उड़ा दीं। लेकिन सत्ता पर उनकी पकड़ इतनी मजबूत है कि विपक्षी नेता उन्हें ‘तानाशाह’ कहते हुए भी कुछ नहीं कर पाते।

सत्ता का सफर: 43 साल का ‘राज’

1982 से अब तक बिया का शासन कैमरून के इतिहास का सबसे लंबा रहा है। वे देश के दूसरे राष्ट्रपति हैं (1960 में फ्रांस से आजादी के बाद)। शुरुआती दौर में उन्होंने आर्थिक संकट से निपटा और एकदलीय शासन से बहुदलीय प्रणाली की ओर कदम बढ़ाया। लेकिन बाद में सत्ता केंद्रीकृत हो गई। अंग्रेजी भाषी क्षेत्रों (अंग्लोफोन) में अलगाववादी आंदोलन को दबाने के लिए सेना का इस्तेमाल किया, जिसमें हजारों मौतें हुईं। बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे आज भी आम हैं।

इस चुनाव में विपक्ष ने धांधली का आरोप लगाया। त्चिरोमा ने दावा किया कि उनके पास 80 प्रतिशत मतों का डेटा है, जिसमें वे 54.8 प्रतिशत से जीते। लेकिन परिणामों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुए, खासकर डौआला में, जहां चार लोगों की मौत हो गई। सरकार ने प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगा दिया। मानवाधिकार कार्यकर्ता फेलिक्स एग्बोर नकॉन्घो ने कहा, “देश को नई पीढ़ी की जरूरत है, न कि सत्ता पर चिपके रहने वाले नेता की।”

दुनिया भर में बहस: लोकतंत्र का सवाल?

बिया की जीत ने वैश्विक स्तर पर बहस छेड़ दी है। यूरोपीय संघ और अमेरिका जैसे देशों ने चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं। अफ्रीकी संघ ने बधाई दी, लेकिन विपक्षी समूहों ने इसे ‘चुनाव चोरी’ बताया।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह जीत कैमरून को और अस्थिरता की ओर ले जा सकती है। अगर बिया सात साल का नया टर्म पूरा करें, तो वे 99 साल के होंगे। लेकिन सवाल वही है—क्या यह लोकतंत्र है या सत्ता का लंबा खेल? दुनिया की नजरें अब याउंडे पर टिकी हैं।

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