सुप्रीम कोर्ट: “युवा भटकें तो भी संवाद हो, आक्रामकता से बढ़ेगा तनाव”—जंतर-मंतर प्रदर्शन मामले में बड़ा बयान
सुप्रीम कोर्ट: “युवा भटकें तो भी संवाद हो, आक्रामकता से बढ़ेगा तनाव”—जंतर-मंतर प्रदर्शन मामले में बड़ा बयान
नई दिल्ली: दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए छात्र प्रदर्शन और विवाद से जुड़ी याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार और कानून-व्यवस्था संभालने वाली एजेंसियों को युवाओं के प्रति संवेदनशील रुख अपनाने की सख्त हिदायत दी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि यदि कुछ युवा भटककर पत्थरबाजी जैसी हिंसक घटनाओं में शामिल हो भी जाएं, तो भी राज्य का पहला काम लाठीचार्ज या बल प्रयोग की बजाय संवाद और काउंसलिंग के जरिए उन्हें समझाना होना चाहिए।
1. सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां
संवाद और काउंसलिंग जरूरी: अदालत ने कहा कि भटके हुए युवाओं को सही रास्ते पर लाने के लिए मार्गदर्शन और काउंसलिंग की आवश्यकता होती है। पूरी भीड़ या समूह को एक ही चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए।
पुलिस और प्रशासन बरतें संयम: चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि प्रशासन का आक्रामक रवैया केवल सामाजिक तनाव को बढ़ाएगा। पुलिस को ऐसी स्थितियों में धैर्य और अत्यधिक संवेदनशीलता दिखानी चाहिए।
शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोकतांत्रिक अधिकार: पीठ ने माना कि शांतिपूर्ण विरोध लोकतांत्रिक व्यवस्था का अहम हिस्सा है, और एजेंसियों को नागरिक अधिकारों व सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखना चाहिए।
2. याचिकाकर्ता के मुख्य तर्क और मांगें
पूर्व आईएफएस अधिकारी मनीष सोलंकी द्वारा दायर इस याचिका में कई अहम मुद्दे उठाए गए:
आयोजकों की जवाबदेही तय हो: याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि 15 दिन बीत जाने के बाद भी प्रदर्शन के तथाकथित आयोजकों पर कार्रवाई नहीं हुई है। हाई-सिक्योरिटी जोन में हुई हिंसा के लिए आयोजकों को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।
टीवी चैनलों पर बयानबाजी: वकील ने आरोप लगाया कि आयोजक टीवी चैनलों पर भड़काऊ बयान दे रहे हैं, जिससे माहौल शांत होने के बजाय और बिगड़ रहा है।
सामुदायिक सेवा (Community Service) की सजा: याचिका में मांग की गई है कि अभद्र और आपत्तिजनक टिप्पणियां करने वाले युवाओं को 7 दिन की ‘सामुदायिक सेवा’ की सुधारात्मक सजा दी जाए, ताकि उन्हें अपनी गलती का अहसास हो।
3. आगे की कार्रवाई
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सुरक्षा एजेंसियों के पास स्थिति से निपटने का व्यावहारिक अनुभव है और उनके विवेक पर भरोसा किया जाना चाहिए। अदालत ने मौजूदा याचिका को इस विषय से जुड़ी अन्य लंबित याचिकाओं के साथ जोड़ (Club) दिया है। इस मामले की अगली सुनवाई अब 18 अगस्त को होगी।
