नवरात्रि से पहले गरबा आयोजनों में मुस्लिमों की एंट्री को लेकर महाराष्ट्र से मध्य प्रदेश तक सियासी घमासान
नवरात्रि से पहले गरबा आयोजनों में मुस्लिमों की एंट्री को लेकर महाराष्ट्र से मध्य प्रदेश तक सियासी घमासान
शारदीय नवरात्रि की शुरुआत से ठीक पहले गरबा पंडालों में गैर-हिंदुओं और विशेषकर मुस्लिमों की एंट्री को लेकर महाराष्ट्र से लेकर मध्य प्रदेश तक सियासत गरमा गई है। बीजेपी विधायकों के बयानों और कांग्रेस के तीखे पलटवार के बाद यह मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है।
बीजेपी विधायकों के विवादित और तीखे बयान
संजय उपाध्याय (बोरीवली, महाराष्ट्र): मुंबई के बोरीवली से बीजेपी विधायक संजय उपाध्याय का कहना है कि जो मुस्लिम युवक गरबा में शामिल होना चाहते हैं, उनका स्वागत है, लेकिन उन्हें कार्यक्रम की परंपराओं का सम्मान करना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि वे अपनी मां या पत्नी के साथ आएं, माथे पर तिलक लगाएं और आरती में भी हिस्सा लें।
रामेश्वर शर्मा (हुज़ूर, मध्य प्रदेश): मध्य प्रदेश के बीजेपी विधायक रामेश्वर शर्मा ने इस पर और अधिक आक्रामक रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि केवल गरबा में आने के बजाय मुस्लिम युवाओं को “परमानेंट” रूप से इस तरफ आ जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “तिलक लगाओ, जय श्रीराम बोलो, गोमाता की रक्षा करो, कोई दिक्कत नहीं है।” इसके साथ ही उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि गरबा में केवल लड़के ही क्यों आते हैं, उन्हें अपनी बहन-बेटियों को भी साथ लेकर आना चाहिए।
कांग्रेस का पलटवार: ‘नफरत फैलाने की राजनीति’
बीजेपी नेताओं के इन बयानों पर कांग्रेस पार्टी ने कड़ी आपत्ति जताई है। मध्य प्रदेश से कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने रामेश्वर शर्मा के बयान पर तीखा पलटवार करते हुए इसे सामाजिक और धार्मिक सौहार्द बिगाड़ने वाला करार दिया। मसूद ने आरोप लगाया कि कुछ नेता केवल राजनीतिक लाभ के लिए और समाज में नफरत फैलाने के वास्ते ऐसे बयान दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि धार्मिक आयोजनों को राजनीति का अखाड़ा बनाने के बजाय आपसी भाईचारे और शांति का संदेश दिया जाना चाहिए।
गरबा एंट्री विवाद की पृष्ठभूमि
मध्य प्रदेश और गुजरात समेत देश के कई राज्यों में पिछले कुछ वर्षों से गरबा आयोजनों में एंट्री को लेकर सख्त नियम बनाने की मांग उठती रही है।
कई हिंदू संगठन और आयोजक पंडालों में प्रवेश के लिए आधार कार्ड या अन्य पहचान पत्र की जांच अनिवार्य करने की मांग करते हैं, ताकि आयोजनों की पवित्रता बनी रहे।
वहीं, दूसरी ओर विपक्षी दल और कई सामाजिक संगठन इस तरह की पाबंदियों को समाज में ध्रुवीकरण और भेदभाव बढ़ाने की राजनीति बताते हैं।
फिलहाल, नवरात्रि से पहले इन बयानों के सामने आने के बाद राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है और यह मामला गरमाता जा रहा है।
