हिमालयी क्षेत्र में भूकंप का खतरा बरकरार, वैज्ञानिकों ने दी गंभीर चेतावनी
हिमालयी क्षेत्र में भूकंप का खतरा बरकरार, वैज्ञानिकों ने दी गंभीर चेतावनी
दुनिया के विभिन्न हिस्सों में लगातार भूकंपीय गतिविधियां दर्ज की जा रही हैं। हाल ही में भूटान और फिलीपींस में आए भूकंपों के साथ-साथ भारत के हिमालयी राज्यों में भी लगातार झटके महसूस किए गए हैं, जिससे क्षेत्रीय भूकंप जोखिम को लेकर चिंता बढ़ गई है।
पिछले 6 महीनों में 600 से अधिक भूकंप दर्ज
आंकड़ों के अनुसार, भारत में पिछले छह महीनों में 634 से अधिक भूकंप के झटके दर्ज किए गए हैं। इनमें सबसे अधिक गतिविधि उत्तर और उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में देखी गई, जहां कुल मिलाकर 478 भूकंप दर्ज हुए।
विशेषज्ञों के मुताबिक, यह क्षेत्र लगातार भूकंपीय तनाव में है, जिसका मुख्य कारण भारतीय और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेटों का टकराव है।
हिमालय क्षेत्र सबसे अधिक संवेदनशील
भूकंप के लिहाज से हिमालय क्षेत्र को सबसे संवेदनशील माना जाता है। इसका कारण यह है कि भारतीय प्लेट हर वर्ष लगभग 5 सेंटीमीटर उत्तर की ओर बढ़ते हुए यूरेशियन प्लेट के नीचे धंस रही है। इस प्रक्रिया के कारण पृथ्वी की सतह पर लगातार दबाव बनता रहता है, जो समय-समय पर भूकंप के रूप में निकलता है।
महीनों के अनुसार भूकंप का वितरण
पिछले छह महीनों के आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि भूकंप की तीव्रता और संख्या लगातार बनी हुई है:
दिसंबर 2025: 72 भूकंप
जनवरी 2026: 64 भूकंप
फरवरी 2026: 136 भूकंप (सिक्किम में सबसे अधिक 74)
मार्च 2026: 112 भूकंप
अप्रैल 2026: 134 भूकंप
मई 2026: 125 भूकंप
इनमें असम, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र रहे हैं।
‘सेंट्रल सीस्मिक गैप’ पर वैज्ञानिकों की चिंता
विशेषज्ञों के अनुसार, उत्तराखंड क्षेत्र को “सेंट्रल सीस्मिक गैप” कहा जाता है, क्योंकि यहां पिछले लगभग 500 वर्षों में कोई बड़ा भूकंप दर्ज नहीं हुआ है। यह स्थिति वैज्ञानिकों के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि इससे जमीन के भीतर ऊर्जा का संचय लगातार बढ़ सकता है।
उत्तराखंड और आसपास के अधिकांश क्षेत्र भूकंप के जोन-4 और जोन-5 में आते हैं, जिन्हें उच्च जोखिम वाला क्षेत्र माना जाता है।
इतिहास में बड़े भूकंपों की याद
हिमालयी क्षेत्र पहले भी विनाशकारी भूकंपों का सामना कर चुका है:
1905: कांगड़ा (7.8 तीव्रता)
1934: बिहार-नेपाल सीमा (8.2 तीव्रता)
1950: असम (8.6 तीव्रता)
2015: नेपाल (7.8 तीव्रता)
विशेषज्ञों का कहना है कि इन घटनाओं ने क्षेत्र में जमा तनाव को पूरी तरह खत्म नहीं किया है।
वैज्ञानिकों की स्पष्ट चेतावनी
वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के विशेषज्ञों के अनुसार, पूरा हिमालय क्षेत्र लंबे समय से टेक्टोनिक दबाव में है। भारतीय और यूरेशियन प्लेटों के लगातार टकराव के कारण यहां छोटे भूकंप आते रहना सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि बड़े भूकंप का खतरा खत्म हो गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि छोटे-छोटे भूकंप कभी-कभी बड़े भूकंप की संभावना को कम नहीं करते, बल्कि यह संकेत हो सकते हैं कि क्षेत्र में ऊर्जा अभी भी जमा है।
निष्कर्ष
हिमालयी क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति और लगातार बढ़ती भूकंपीय गतिविधियां इसे दुनिया के सबसे जोखिमपूर्ण क्षेत्रों में से एक बनाती हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यहां भविष्य में बड़े भूकंप की संभावना को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ऐसे में बेहतर निगरानी, आपदा तैयारी और जागरूकता बेहद जरूरी है।
