जंतर-मंतर प्रदर्शनकारियों पर दर्ज FIR वापस लेने की प्रक्रिया: सरकार के आदेश के बाद भी अदालत की मुहर जरूरी
जंतर-मंतर प्रदर्शनकारियों पर दर्ज FIR वापस लेने की प्रक्रिया: सरकार के आदेश के बाद भी अदालत की मुहर जरूरी
नई दिल्ली। जंतर-मंतर पर CJP (कॉकरोच जनता पार्टी) के लंबे प्रदर्शन और 20 जुलाई की हिंसा के बाद दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ करीब 15-20 FIR दर्ज की थीं। इनमें ज्यादातर गैरकानूनी जमाव, हिंसा और संबंधित धाराएं शामिल हैं। सरकार ने प्रदर्शन समाप्त होने के बाद इन FIR को वापस लेने का आश्वासन दिया है, लेकिन ये केस अपने आप खत्म नहीं होंगे। कानूनी प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है।
कानूनी प्रक्रिया क्या है?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 360 के तहत अभियोजन से हटने (Withdrawal from Prosecution) का प्रावधान है। सरकार सीधे FIR रद्द नहीं कर सकती। प्रक्रिया इस प्रकार है:
सरकार का फैसला: केंद्र सरकार (क्योंकि दिल्ली पुलिस गृह मंत्रालय के अधीन है) इन मामलों को आगे नहीं बढ़ाने का औपचारिक निर्णय लेती है।
LG को प्रस्ताव: दिल्ली पुलिस की अभियोजन शाखा/लीगल सेल उपराज्यपाल (LG) को पत्र लिखकर अनुरोध करती है कि इन मामलों में आगे मुकदमा नहीं चलाया जाए।
LG की मंजूरी: उपराज्यपाल की अनुमति मिलने के बाद प्रक्रिया आगे बढ़ती है।
अदालत में आवेदन: लोक अभियोजक (Public Prosecutor) संबंधित अदालत में आवेदन दाखिल करता है कि राज्य इन मामलों में अभियोजन से हट रहा है।
अदालत का अंतिम फैसला: अदालत आवेदन पर विचार करती है और अनुमति दे सकती है। बिना अदालत की सहमति के केस पूरी तरह वापस नहीं होता।
दिल्ली पुलिस के अधिकारियों के अनुसार, अभी तक सरकार का औपचारिक आदेश नहीं मिला है। आदेश मिलते ही LG के पास प्रस्ताव भेजा जाएगा।
किन मामलों में FIR वापस नहीं होंगी?
पत्रकारों पर हुए हमलों या मारपीट के मामले, जो पत्रकारों ने खुद दर्ज कराए हैं, वापस नहीं लिए जाएंगे। इनके लिए शिकायतकर्ता की सहमति जरूरी है।
गंभीर धाराओं वाले केस (जैसे जानलेवा हमला या बड़ी सार्वजनिक संपत्ति क्षति) में अदालत सख्ती बरत सकती है।
अन्य विकल्प क्या हैं?
क्लोजर रिपोर्ट: अगर सबूत कमजोर हों या चार्जशीट न दाखिल हुई हो, तो पुलिस अदालत में क्लोजर/कैंसिलेशन रिपोर्ट दाखिल कर सकती है। अदालत इसे स्वीकार करे तो केस बंद हो जाता है।
हाईकोर्ट में क्वैशिंग: गंभीर मामलों में या निचली अदालत राहत न दे तो हाईकोर्ट में BNSS की संबंधित धारा के तहत याचिका दायर कर FIR रद्द कराने का विकल्प खुला है।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि राजनीतिक या सामाजिक प्रदर्शनों से जुड़े कई मामलों में सरकारें पहले भी इसी प्रक्रिया से केस वापस ले चुकी हैं (जैसे 2022 के किसान आंदोलन से जुड़े कुछ मामले)। लेकिन हर केस में अदालत का स्वतंत्र विवेक लागू होता है।
अभी प्रक्रिया शुरू होने का इंतजार है। CJP ने चेतावनी दी है कि अगर जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो नया आंदोलन शुरू हो सकता है। प्रदर्शनकारियों को सलाह दी जाती है कि वे कानूनी सलाह लें और अदालती प्रक्रिया का पालन करें। FIR दर्ज होने का मतलब स्वतः दोषी होना नहीं है।
