विभुवन संकष्टी चतुर्थी: शुभ योगों के संयोग में विघ्नहर्ता की आराधना, जानिए शुभ मुहूर्त और चंद्र दर्शन का महत्व
विभुवन संकष्टी चतुर्थी: शुभ योगों के संयोग में विघ्नहर्ता की आराधना, जानिए शुभ मुहूर्त और चंद्र दर्शन का महत्व
नई दिल्ली: ज्येष्ठ अधिक मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली विभुवन संकष्टी चतुर्थी का सनातन परंपरा में विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। इस वर्ष यह दुर्लभ व्रत शुभ और शुक्ल योग के अनूठे संयोग में मनाया जा रहा है, जिससे इसकी आध्यात्मिक महत्ता और अधिक बढ़ गई है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत, पूजन, जप और दान करने से जीवन की सभी बाधाओं का निवारण होता है।
भद्रा का नहीं रहेगा पृथ्वी पर प्रभाव
धार्मिक गणनाओं के अनुसार, आज प्रातः 8:12 से रात्रि 9:21 तक भद्रा का काल रहेगा। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भद्रा का प्रभाव केवल तभी मान्य होता है जब वह पृथ्वी लोक में हो। आज चंद्रमा धनु राशि में स्थित है, जिसके कारण भद्रा का वास पृथ्वी पर नहीं माना जा रहा है। अतः श्रद्धालु बिना किसी संशय के भगवान गणेश की पूजा-अर्चना कर सकते हैं।
चंद्र दर्शन के बाद ही पूर्ण होगा व्रत
संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्र दर्शन के बिना अधूरा माना जाता है। व्रती दिनभर उपवास रखकर रात्रि में चंद्रमा के दर्शन करते हैं और उन्हें अर्घ्य अर्पित करते हैं। इसके पश्चात भगवान गणेश की पूजा कर व्रत का पारण किया जाता है।
दिनभर के शुभ मुहूर्त
ब्रह्म मुहूर्त: प्रातः 04:02 से 04:43 तक
विजय मुहूर्त: दोपहर 02:38 से 03:34 तक
गोधूलि मुहूर्त: सायंकाल 07:14 से 07:34 तक
अमृत काल: सायंकाल 07:37 से रात्रि 09:24 तक
निशीथ मुहूर्त: रात्रि 11:59 से अगले दिन प्रातः 12:40 तक
पूजन विधि और नारियल के लड्डू का भोग
इस पावन अवसर पर प्रातः स्नानादि के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर भगवान गणेश के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित करें। गणपति का शुद्ध जल से अभिषेक कर उन्हें पुष्प, फल, चंदन और नारियल से बने लड्डुओं का भोग लगाएं। इसके बाद संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा का पाठ करें और गणेश मंत्रों का जप करें। रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देकर और क्षमा याचना के साथ व्रत का समापन करें।
