बंगाल चुनाव और शराबबंदी: क्या है नया आदेश?
बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान शराबबंदी के ताजा आदेश ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। चुनाव आयोग के इस फैसले से न केवल कारोबारी परेशान हैं, बल्कि इस पर सियासत भी गरमा गई है।
चुनाव और शराबबंदी: क्या है नया आदेश?
आदेश के मुताबिक, बंगाल के उन हिस्सों में भी शराबबंदी लागू कर दी गई है जहाँ पहले चरण में मतदान नहीं है। पाबंदियों का शेड्यूल कुछ इस प्रकार है:
20 अप्रैल से 23 अप्रैल: शराब बेचने और परोसने पर पूर्ण पाबंदी।
24 अप्रैल: दुकानें खुलेंगी।
25 अप्रैल (शाम 6 बजे) से 29 अप्रैल: दुकानें और बार फिर से बंद रहेंगे।
4 मई (मतगणना का दिन): इस दिन भी ड्राई डे घोषित किया गया है।
इसका अर्थ यह है कि अगले 15 दिनों में से साढ़े नौ दिन तक बंगाल में शराब की बिक्री और सर्विस पूरी तरह बंद रहेगी।
राजस्व और कारोबार पर भारी चोट
इस लंबी शराबबंदी का आर्थिक असर काफी व्यापक होने की आशंका है:
1400 करोड़ का कुल नुकसान: अनुमान है कि इस अवधि में सरकार और कारोबारियों को करीब 1400 करोड़ रुपये का घाटा होगा।
कोलकाता पर असर: कुल नुकसान में से अकेले 900 करोड़ रुपये का नुकसान कोलकाता में होने की उम्मीद है।
दुकानें और बार: पश्चिम बंगाल में लगभग 5400 शराब की दुकानें और बार हैं। इनका औसत दैनिक कारोबार 80 से 90 करोड़ रुपये के बीच रहता है।
सहायक उद्योग: बार और दुकानों के बंद होने से रेस्टोरेंट और खान-पान के अन्य व्यवसायों की सेल पर भी बुरा असर पड़ेगा।
कारोबारियों की चिंता और नाराजगी
शराब कारोबारियों का कहना है कि प्रशासन ने पहले उन्हें ’96 घंटे’ की पाबंदी की बात कही थी, लेकिन लिखित आदेश में दोनों चरणों को मिलाकर पाबंदी का समय काफी बढ़ा दिया गया है। व्यापारियों का तर्क है कि कोलकाता में पहले चरण में चुनाव नहीं हैं, फिर भी वहां कारोबार बंद रखना तर्कसंगत नहीं है। इससे पहले चुनाव आयोग ने स्टॉक को आधा करने का भी निर्देश दिया था, जिससे व्यापारी पहले से ही दबाव में थे।
सियासी घमासान: “चुनाव आयोग बनाम TMC”
इस मुद्दे ने अब राजनीतिक रंग ले लिया है:
TMC का रुख: तृणमूल कांग्रेस के नेता अरूप चक्रवर्ती ने चुनाव आयोग पर निशाना साधते हुए कहा कि आयोग “बीजेपी की एजेंसी” की तरह काम कर रहा है। उन्होंने मोटरसाइकिल पर पाबंदी और शराबबंदी जैसे फैसलों को आम जनता की परेशानी का कारण बताया और कहा कि बीजेपी हार के डर से ऐसे कदम उठवा रही है।
विपक्ष का तर्क: चुनाव आयोग इन कदमों को निष्पक्ष और शांतिपूर्ण मतदान सुनिश्चित करने के लिए जरूरी बता रहा है।
निष्कर्ष: बंगाल में चुनाव के इस दौर में शराबबंदी केवल प्रशासनिक आदेश नहीं रह गई है, बल्कि यह करोड़ों के नुकसान और तीखी बयानबाजी के साथ एक बड़ा चुनावी मुद्दा बन चुकी है।
