उत्तराखंड में ‘बाघ’ का तांडव: 3 महीने में हमलों का शतक पार, 20 की मौत; वन विभाग के दावों की खुली पोल
उत्तराखंड में ‘बाघ’ का तांडव: 3 महीने में हमलों का शतक पार, 20 की मौत; वन विभाग के दावों की खुली पोल
देहरादून: देवभूमि उत्तराखंड में मानव और वन्यजीवों के बीच का संघर्ष साल 2026 की शुरुआत में ही बेहद डरावने मोड़ पर पहुँच गया है। स्थिति यह है कि महज़ 90 दिनों के भीतर वन्यजीवों के हमलों का आंकड़ा 100 के पार निकल चुका है। इन हमलों में सबसे आक्रामक और घातक रूप में ‘टाइगर’ (बाघ) उभरकर सामने आया है, जिसने पहाड़ी बस्तियों में खौफ का माहौल पैदा कर दिया है।
खौफनाक आंकड़े: 3 महीने, 20 मौतें और 97 घायल
साल 2026 की पहली तिमाही (जनवरी से मार्च) के आंकड़े राज्य की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं:
कुल मौतें: 20 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं।
घायल: 97 लोग जानवरों के हमले में जख्मी हुए हैं।
बाघ का कहर: कुल 20 मौतों में से 10 मौतें अकेले बाघ के हमलों से हुई हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि बाघ के हमले में कोई घायल नहीं हुआ; जिसने भी सामना किया, उसकी जान चली गई।
प्रभावित क्षेत्र: रामनगर डिवीजन में 3 और नैनीताल डिवीजन में 2 मौतें बाघ के कारण दर्ज की गई हैं।
2025 बनाम 2026: बढ़ती रफ्तार ने डराया
यदि पिछले साल से तुलना करें, तो हालात और भी भयावह नजर आते हैं। साल 2025 में पूरे 12 महीनों के दौरान 68 मौतें हुई थीं। वहीं, 2026 में महज़ 3 महीनों में ही यह आंकड़ा 20 तक पहुँच गया है। अगर यही रफ्तार रही, तो इस साल के अंत तक स्थिति नियंत्रण से बाहर हो सकती है।
वन विभाग की दलील: “बदल रहा है जानवरों का व्यवहार”
प्रमुख वन संरक्षक (हॉफ) रंजन कुमार मिश्रा के अनुसार, वन्यजीवों के मूवमेंट पैटर्न में बड़ा बदलाव आया है। उन्होंने बताया:
”जंगलों में भोजन की कमी और प्राकृतिक आवास सिकुड़ने की वजह से जानवर अब बस्तियों की ओर रुख कर रहे हैं। इस बदलाव को समझना और समय रहते कदम उठाना बेहद जरूरी है।”
वन मंत्री की अपील: “सतर्कता ही बचाव है”
वन मंत्री सुबोध उनियाल ने बढ़ते संघर्ष पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि विभाग सोलर लाइट लगाने और गश्त बढ़ाने जैसे कदम उठा रहा है। उन्होंने ग्रामीणों से अपील की है कि:
जंगल के किनारे या भीतर बिना सतर्कता के न जाएं।
विभाग द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन करें।
स्कूली बच्चों की सुरक्षा को लेकर विशेष सावधानी बरतें।
धरातल पर चुनौतियां
स्थानीय लोगों का आरोप है कि वन विभाग का तंत्र इस संघर्ष को रोकने में नाकाम साबित हो रहा है। केवल जागरूकता अभियानों से बाघ और गुलदार जैसे शिकारी जानवरों को बस्तियों में आने से नहीं रोका जा सकता। जब तक जंगलों के भीतर जानवरों के लिए पर्याप्त शिकार और सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक वे आबादी वाले क्षेत्रों का रुख करते रहेंगे।
निष्कर्ष: उत्तराखंड जैसे वन प्रधान राज्य में मानव-वन्यजीव संघर्ष को पूरी तरह खत्म करना नामुमकिन है, लेकिन बेहतर मॉनिटरिंग और आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल से जनहानि को कम किया जा सकता है। फिलहाल, रामनगर और नैनीताल जैसे क्षेत्रों में लोग शाम ढलते ही घरों में कैद होने को मजबूर हैं।
