राजनीति

​हिमाचल में ‘आर्थिक आपातकाल’ जैसी स्थिति! CM से लेकर DGP तक की सैलरी पर रोक; सरकार ने उठाया बड़ा कदम

हिमाचल प्रदेश में आर्थिक चुनौतियों से जूझ रही सुक्खू सरकार ने एक कड़ा फैसला लेते हुए वीआईपी कल्चर और उच्च अधिकारियों के वेतन पर कैंची चलाई है। सरकार के इस कदम ने राज्य की सियासत में हलचल पैदा कर दी है।

​हिमाचल में ‘आर्थिक आपातकाल’ जैसी स्थिति! CM से लेकर DGP तक की सैलरी पर रोक; सरकार ने उठाया बड़ा कदम

​शिमला: हिमाचल प्रदेश में गहराते वित्तीय संकट के बीच सुखविंद्र सिंह सुक्खू सरकार ने एक ऐतिहासिक और कड़ा प्रशासनिक फैसला लिया है। प्रदेश की डगमगाती अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए सरकार ने मुख्यमंत्री, मंत्रियों, विधायकों और वरिष्ठ अधिकारियों के वेतन का एक बड़ा हिस्सा अगले छह महीने के लिए अस्थायी रूप से स्थगित (Defer) करने की अधिसूचना जारी कर दी है।

​वेतन स्थगन का नया ढांचा: किसे कितनी मिलेगी सैलरी?

​सरकार की अधिसूचना के अनुसार, अप्रैल 2026 के वेतन (जिसका भुगतान मई में होना है) से निम्नलिखित कटौती लागू होगी:

​राजनीतिक नेतृत्व:

​मुख्यमंत्री: 50% वेतन स्थगित।

​उपमुख्यमंत्री व मंत्री: 30% वेतन स्थगित।

​विधायक: 20% वेतन स्थगित।

​प्रशासनिक अधिकारी:

​मुख्य सचिव, ACS, प्रधान सचिव और DGP: 30% वेतन रोका जाएगा।

​सचिव, विभागाध्यक्ष, IG, DIG, SP व वन अधिकारी: 20% वेतन स्थगित रहेगा।

​नोट: सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह स्थायी कटौती नहीं है। वित्तीय स्थिति सुधरने पर यह राशि वापस दी जाएगी और इसे पेंशन व लीव एनकैशमेंट के लिए भी गिना जाएगा।

​मुख्यमंत्री का पक्ष: “विकास के लिए जरूरी कदम”

​मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने इस फैसले का बचाव करते हुए कहा कि राज्य की आर्थिक सेहत सुधारने के लिए कड़े निर्णय लेना आवश्यक है। वहीं, कैबिनेट मंत्री जगत नेगी ने कहा कि प्रदेश में विकास कार्य न रुकें, इसलिए यह फैसला लिया गया है। उन्होंने नेता प्रतिपक्ष पर पलटवार करते हुए कहा कि उन्हें नसीहत देने के बजाय खुद की सुविधाएं छोड़नी चाहिए।

​विपक्ष का हमला: “यह वित्तीय आपातकाल है”

​इस फैसले के बाद हिमाचल की राजनीति गरमा गई है। विपक्ष ने सरकार को ‘आर्थिक कुप्रबंधन’ का जिम्मेदार ठहराया है:

​जयराम ठाकुर (नेता प्रतिपक्ष): उन्होंने इसे “वित्तीय आपातकाल” करार देते हुए कहा कि सरकार फिजूलखर्ची रोकने में नाकाम रही है।

​प्यार सिंह (मीडिया सह-प्रभारी): उन्होंने इस कदम को ‘राजनितिक दिखावा’ बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि एक तरफ वेतन रोका जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ बोर्ड निगमों के चेयरमैन की सैलरी में 800% तक की बढ़ोतरी की गई है।

​पहले भी लिए गए थे कड़े फैसले

​यह पहली बार नहीं है जब सुक्खू सरकार ने वित्तीय बोझ कम करने की कोशिश की है। मार्च 2026 में भी सरकार ने बोर्ड और निगमों के पदाधिकारियों का कैबिनेट रैंक वापस लेते हुए उनके भत्तों में 20% की कटौती की थी।

​निष्कर्ष: हिमाचल प्रदेश की आर्थिक स्थिति वर्तमान में बेहद नाजुक दौर से गुजर रही है। सरकारी कर्मचारियों और पेंशनरों की देनदारियों के बीच, शीर्ष नेतृत्व के वेतन को स्थगित करना एक प्रतीकात्मक संदेश तो दे रहा है, लेकिन क्या यह राज्य को कर्ज के जाल से बाहर निकालने में पर्याप्त होगा? यह आने वाला वक्त ही बताएगा।

​क्या आप सरकार के इस फैसले को आर्थिक सुधार की दिशा में सही कदम मानते हैं या यह महज एक राजनीतिक स्टंट है?

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