शादीशुदा व्यक्ति का लिव-इन रिलेशनशिप में रहना जायज है? जानें कोर्ट ने क्या कहा
शादीशुदा व्यक्ति का लिव-इन रिलेशनशिप में रहना जायज है? जानें कोर्ट ने क्या कहा
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि शादीशुदा पुरुष का किसी वयस्क (बालिग) महिला के साथ आपसी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रहना अपने आप में कोई अपराध नहीं है।
कोर्ट का मुख्य फैसला:
एक याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की बेंच ने स्पष्ट किया कि अगर कोई शादीशुदा पुरुष किसी बालिग महिला के साथ उसकी मर्जी से लिव-इन में रह रहा है, तो इसे कानूनी अपराध नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने कहा, “सामाजिक नैतिकता और कानून को अलग रखना चाहिए।” अदालत का कर्तव्य नागरिकों के मौलिक अधिकारों (Article 21) की रक्षा करना है, न कि सामाजिक नैतिकता को लागू करना।
कोर्ट ने याचिका दायर करने वाले कपल को पुलिस सुरक्षा देने का आदेश दिया और महिला की मां द्वारा दर्ज अपहरण की FIR पर रोक लगा दी।
मामले की पृष्ठभूमि:
शाहजहांपुर (उत्तर प्रदेश) के एक कपल ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। महिला की मां ने अपहरण और अन्य धाराओं में FIR दर्ज कराई थी। परिवार का आरोप था कि शादीशुदा पुरुष के साथ लिव-इन रहना गलत है। कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि सहमति से वयस्कों का रिश्ता कानून के तहत अपराध नहीं बनता, जब तक कि कोई अन्य कानूनी उल्लंघन (जैसे जबरदस्ती) न हो।
महत्वपूर्ण टिप्पणी:
कोर्ट ने जोर दिया कि “मॉरलिटी (नैतिकता) और लॉ (कानून) को अलग रखा जाना चाहिए।” अगर कोई कार्य कानून की किसी धारा के तहत अपराध नहीं बनता, तो सिर्फ समाज की सोच के आधार पर उसे गलत नहीं ठहराया जा सकता।
ध्यान देने योग्य बातें:
यह फैसला आपराधिक मुकदमे और पुलिस सुरक्षा के संदर्भ में है। लिव-इन रिलेशनशिप को अपराध नहीं माना गया।
हालांकि, व्यक्तिगत कानून (जैसे हिंदू मैरिज एक्ट) के तहत शादीशुदा व्यक्ति की दूसरी शादी (बिगामी) अवैध है। लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिला को वैवाहिक अधिकार (जैसे मेंटेनेंस, संपत्ति) नहीं मिल सकते, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों (D. Velusamy, Indra Sarma) में कहा गया है।
कुछ पुराने फैसलों में हाईकोर्ट ने अलग रुख अपनाया था, लेकिन इस हालिया फैसले में अपराध न होने पर जोर दिया गया है।
यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सहमति पर आधारित है, लेकिन सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों से अलग मुद्दा है। कानूनी सलाह के लिए वकील से संपर्क करें, क्योंकि हर मामला तथ्यों पर निर्भर करता है।
