युद्ध की तबाही: जंग की आग जलवायु संकट को और भड़का रही है
युद्ध की तबाही: जंग की आग जलवायु संकट को और भड़का रही है
आज की दुनिया में शांति की जगह हिंसा और संघर्ष ने ले ली है। वर्तमान में विश्व भर में दर्जनों सक्रिय युद्ध और सशस्त्र झड़पें चल रही हैं, जिनमें लाखों लोग प्रभावित हो रहे हैं। लेकिन इन युद्धों का असर सिर्फ मानवीय और आर्थिक स्तर तक सीमित नहीं है—यह सीधे हमारी धरती के पर्यावरण और जलवायु को तबाह कर रहा है।
युद्ध के दौरान भारी मात्रा में हथियारों, टैंकों, लड़ाकू विमानों और तोपों का इस्तेमाल होता है, जो जीवाश्म ईंधन पर निर्भर होते हैं। इससे हर दिन लाखों टन कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसें वातावरण में फैलती हैं। उदाहरण के लिए, यूक्रेन में जारी संघर्ष के पहले कुछ वर्षों में ही लगभग ३० करोड़ टन से अधिक CO₂ समकक्ष उत्सर्जन हुआ है—यह उतना है जितना कुछ बड़े यूरोपीय देशों का सालाना उत्सर्जन होता है। इसी तरह, मध्य पूर्व में चल रहे तनाव और संघर्षों में तेल भंडारों पर हमलों से आग लगने और तेल जलने की घटनाएं बढ़ी हैं, जिससे प्रतिदिन भारी प्रदूषण फैल रहा है।
ये उत्सर्जन न सिर्फ वैश्विक तापमान को बढ़ाते हैं, बल्कि एक दुष्चक्र भी बनाते हैं। गर्मी और सूखे से जंगल की आग बढ़ती है, जो युद्ध क्षेत्रों में और तेजी से फैलती है। हमलों से बुनियादी ढांचे का विनाश होता है—बिजली संयंत्र, रिफाइनरियां और कारखाने तबाह हो जाते हैं—जिससे और अधिक गैसें निकलती हैं। पुनर्निर्माण के दौरान भी भारी उत्सर्जन होता है। नतीजा? जलवायु संकट तेजी से बढ़ रहा है, चरम मौसमी घटनाएं जैसे बाढ़, सूखा और तूफान आम हो गए हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि सैन्य गतिविधियां वैश्विक उत्सर्जन का एक बड़ा हिस्सा हैं—कुछ अनुमानों के अनुसार ५ प्रतिशत से अधिक। लेकिन युद्ध क्षेत्रों में यह आंकड़ा और भी खतरनाक हो जाता है। दुनिया भर में शरणार्थी और विस्थापित लोग ऐसे इलाकों में जा रहे हैं जहां पहले से ही जलवायु आपदाओं का खतरा ज्यादा है। इससे गरीबी, भुखमरी और नए संघर्षों का खतरा बढ़ता है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने के लिए उत्सर्जन कम करना जरूरी है, लेकिन युद्ध इन प्रयासों पर पानी फेर रहे हैं। अगर शांति नहीं लौटी, तो पेरिस समझौते के लक्ष्य दूर के सपने बन जाएंगे। समय आ गया है कि विश्व समुदाय युद्धों को रोकने के साथ-साथ सैन्य उत्सर्जन को भी जलवायु कार्रवाई में शामिल करे। क्योंकि जंग की आग सिर्फ इंसानों को नहीं, पूरी धरती को झुलसा रही है।
शांति ही एकमात्र रास्ता है जो हमें जलवायु संकट से बचा सकता है।
