महामंडलेश्वर बनने वाली पहली लेडी नागा किन्नर! मां काली नंद गिरी: तंत्र साधना में PhD, 70 सिद्ध खोपड़ियों के साथ घूमना, 18 भाषाओं की ज्ञाता
महामंडलेश्वर बनने वाली पहली लेडी नागा किन्नर! मां काली नंद गिरी: तंत्र साधना में PhD, 70 सिद्ध खोपड़ियों के साथ घूमना, 18 भाषाओं की ज्ञाता
हिंदू अखाड़ों के इतिहास में एक अनोखा और ऐतिहासिक क्षण! मां काली नंद गिरी (Maa Kali Nand Giri) को किन्नर अखाड़ा में पहली बार लेडी नागा किन्नर के रूप में महामंडलेश्वर की उपाधि दी गई है। यह घटना प्रयागराज महाकुंभ 2025 के दौरान हुई, जहां उन्होंने अपनी अघोरी और तांत्रिक साधना से सबको चौंका दिया। 27 साल की उम्र में यह उपलब्धि हासिल करने वाली मां काली नंद गिरी अब अखाड़े की सबसे चर्चित शख्सियत बन चुकी हैं।
कौन हैं मां काली नंद गिरी?
उम्र: 27 वर्ष
पृष्ठभूमि: असम के कामाख्या धाम में 18 साल पहले तंत्र साधना शुरू की। तब से अघोर पंथ में लीन हैं।
शिक्षा: तंत्र साधना में PhD (डॉक्टरेट) पूरी की है – यह उनके तांत्रिक ज्ञान की गहराई दिखाता है।
भाषा ज्ञान: 18 भाषाओं की ज्ञाता – हिंदी, अंग्रेजी, असमिया, बंगाली, संस्कृत, तमिल समेत कई प्राचीन और क्षेत्रीय भाषाएं बोलती और समझती हैं।
अघोरी स्टाइल: 70 सिद्ध खोपड़ियां (human skulls) अपने साथ रखती और घूमती हैं। अघोरियों में खोपड़ी को सिद्धि और शक्ति का प्रतीक माना जाता है। वे इन्हें अपनी साधना का हिस्सा बताती हैं।
नागा किन्नर: किन्नर अखाड़े में नागा (नग्न साधु) परंपरा अपनाई है, जो जूना अखाड़े जैसी परंपराओं से जुड़ी है। वे पहली महिला (लेडी) नागा किन्नर महामंडलेश्वर हैं।
क्यों मिली महामंडलेश्वर की उपाधि?
किन्नर अखाड़ा (जिसकी स्थापना लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने की) ने उन्हें उनकी गहन तांत्रिक साधना, अघोरी जीवनशैली और सनातन धर्म के प्रति समर्पण के लिए यह सम्मान दिया। महाकुंभ में उनकी पेशवाई और शाही स्नान में भी वे शामिल हुईं। हालांकि अखाड़े में पहले भी विवाद हुए हैं (जैसे ममता कुलकर्णी के मामले में), लेकिन मां काली नंद गिरी की नियुक्ति को काफी सकारात्मक लिया जा रहा है।
वे खुद को “महाकाली” कहती हैं और साधना के दौरान समाज के हाशिए पर रहने वाले लोगों की मदद करती हैं। उनकी खोपड़ियों वाली तस्वीरें और भाषा ज्ञान सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं। कुछ लोग उन्हें “आधुनिक अघोरी देवी” कह रहे हैं।
यह उपाधि न सिर्फ किन्नर समुदाय के लिए मील का पत्थर है, बल्कि तंत्र-अघोर परंपरा को नई पीढ़ी से जोड़ने का भी प्रतीक है। क्या लगता है – क्या मां काली नंद गिरी का यह सफर और बड़ा होगा?
