‘वयस्कों में सहमति से बने लंबे संबंधों के बाद शादी का वादा टूटे तो रेप नहीं’, उत्तराखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
‘वयस्कों में सहमति से बने लंबे संबंधों के बाद शादी का वादा टूटे तो रेप नहीं’, उत्तराखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
नैनीताल/देहरादून, 14 फरवरी 2026: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि दो वयस्कों के बीच लंबे समय तक आपसी सहमति से चले शारीरिक संबंधों को बाद में शादी का वादा टूटने पर दुष्कर्म (रेप) नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि शादी का वादा शुरू से झूठा साबित होना चाहिए और केवल सहमति हासिल करने के लिए किया गया हो, तभी इसे IPC की धारा 376 (अब BNS की समकक्ष धारा) के तहत अपराध माना जा सकता है।
जस्टिस अरविंद कुमार की सिंगल बेंच ने देहरादून के सीजेएम कोर्ट के आदेश और मसूरी पुलिस स्टेशन में दर्ज प्राथमिकी को रद्द कर दिया। मामले में आरोपी पर शादी का झांसा देकर दुष्कर्म का आरोप था, लेकिन कोर्ट ने पाया कि दोनों पक्षों के बीच लंबे समय तक मर्जी से साथ रहना, बार-बार बातचीत और सहमति से संबंध बनाना शुरुआती धोखाधड़ी के इरादे के खिलाफ जाता है। कोर्ट ने टिप्पणी की, “मात्र वादा टूटना (mere breach of promise), चाहे नैतिक रूप से कितना भी निंदनीय हो, अपने आप में रेप नहीं बनता जब तक शुरुआती धोखे का सबूत न हो।”
कोर्ट ने आगे कहा कि लंबे समय तक चले सहमति वाले रिश्ते में अगर कोई कारणवश शादी नहीं हो पाती, तो इसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। यह फैसला उन मामलों में अहम है जहां रिश्ते टूटने पर महिला पक्ष शादी के वादे का हवाला देकर केस दर्ज कराती है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने फैसलों का हवाला दिया, जहां स्पष्ट किया गया है कि सहमति से बने रिश्ते को बाद में झूठे वादे का रंग नहीं दिया जा सकता।
यह फैसला उत्तराखंड सहित पूरे देश में ऐसे मामलों पर नई बहस छेड़ सकता है, जहां हाल के वर्षों में शादी के वादे पर रेप के केस बढ़े हैं। कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला व्यक्तिगत संबंधों में कानूनी दखल को सीमित करता है और झूठे वादे vs. रिश्ते टूटने के बीच अंतर स्पष्ट करता है।
