अमेरिका की वापसी से हिल गया पेरिस जलवायु समझौता: वैश्विक प्रयासों पर बड़ा झटका
अमेरिका की वापसी से हिल गया पेरिस जलवायु समझौता: वैश्विक प्रयासों पर बड़ा झटका
पेरिस जलवायु समझौते को दस साल पूरे होने पर वैश्विक स्तर पर चिंताएं बढ़ गई हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल के पहले दिन ही समझौते से अमेरिका की वापसी की घोषणा कर दी, जो जनवरी 2026 में औपचारिक रूप से प्रभावी हो जाएगी। विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम वैश्विक जलवायु सहयोग को गहरा झटका देगा, क्योंकि अमेरिका ऐतिहासिक रूप से सबसे बड़ा उत्सर्जक देश है।
ट्रंप ने समझौते को “अमेरिका के लिए अनुचित और एकतरफा सौदा” करार देते हुए कहा कि यह अमेरिकी उद्योगों को नुकसान पहुंचाता है, जबकि चीन जैसे देश बिना रोक-टोक प्रदूषण फैला रहे हैं। उन्होंने विदेशी जलवायु सहायता रोकने और घरेलू जीवाश्म ईंधन उत्पादन बढ़ाने के संकेत दिए। इससे पहले 2017 में भी ट्रंप ने समझौते से वापसी की थी, जिसे बाइडेन ने 2021 में फिर जोड़ा था। अब अमेरिका ईरान, लीबिया और यमन के साथ उन चुनिंदा देशों में शामिल हो जाएगा जो समझौते से बाहर हैं।
विवादों की मुख्य वजहें:
अमेरिका की वापसी: इससे वैश्विक उत्सर्जन कटौती में 0.1°C का अतिरिक्त बढ़ोतरी का खतरा। कई देशों ने चिंता जताई कि अन्य राष्ट्र भी पीछे हट सकते हैं।
एनडीसी सबमिशन में देरी: 2025 में अपडेटेड राष्ट्रीय योगदान (NDCs) जमा करने की समयसीमा थी, लेकिन भारत, सऊदी अरब, अर्जेंटीना सहित करीब 70 देशों ने इसे मिस किया। भारत ने अभी तक नई एनडीसी जमा नहीं की है।
उत्सर्जन लक्ष्य चूक: संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा प्रतिबद्धताएं 1.5°C लक्ष्य से बहुत दूर हैं। 2025 में उत्सर्जन पीक होने की उम्मीद थी, लेकिन यह 2026 या बाद में होगा।
फॉसिल फ्यूल फेजआउट पर असफलता: ब्राजील में नवंबर 2025 में हुई COP30 सम्मेलन में जीवाश्म ईंधन छोड़ने का रोडमैप नहीं बन सका। तेल उत्पादक देशों के विरोध से केवल स्वैच्छिक योजनाएं बनीं।
अन्य देशों की स्थिति:
यूरोप: यूरोपीय संघ ने मजबूत एनडीसी जमा की और 2035 तक उत्सर्जन में भारी कटौती का वादा किया। लेकिन अमेरिका की अनुपस्थिति से फंडिंग और नेतृत्व पर असर पड़ेगा।
चीन: दुनिया का सबसे बड़ा उत्सर्जक चीन अपनी एनडीसी पर कायम है। वह रिन्यूएबल एनर्जी में निवेश बढ़ा रहा है और नेतृत्व की भूमिका निभा सकता है।
भारत: भारत ने अभी नई एनडीसी नहीं जमा की, लेकिन रिन्यूएबल एनर्जी और अनुकूलन पर फोकस जारी रखा है। विकासशील देशों के साथ मिलकर फाइनेंस और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की मांग मजबूत कर रहा है।
विकासशील देश: कई देशों ने अनुकूलन फंडिंग ट्रिपल करने की मांग की, लेकिन अमीर देशों से पर्याप्त मदद नहीं मिल रही।
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की अनुपस्थिति से चीन और यूरोप को क्लीन एनर्जी में बढ़त मिलेगी, जबकि वैश्विक तापमान वृद्धि 2.3-2.5°C तक पहुंच सकती है। 2026 में तुर्की में COP31 से उम्मीदें हैं कि नए समझौते बने। लेकिन फिलहाल पेरिस समझौता संकट में है।
