CAFE-3 जंग: टाटा vs मारुति, छोटी कारों की छूट पर ऑटो सेक्टर दो खेमों में बंटा!
भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग में इन दिनों गरमागरम बहस छिड़ी हुई है। नए कॉर्पोरेट एवरेज फ्यूल एफिशिएंसी (CAFE-3) नियमों को लेकर मारुति सुजुकी और टाटा मोटर्स जैसे दिग्गज आमने-सामने आ गए हैं। अप्रैल 2027 से लागू होने वाले इन नियमों का मकसद वाहनों की औसत ईंधन दक्षता बढ़ाना और कार्बन उत्सर्जन कम करना है, लेकिन छोटे कारों के लिए वजन-आधारित छूट पर विवाद ने पूरे सेक्टर को दो फाड़ कर दिया है। एक तरफ मारुति सुजुकी राष्ट्रीय हितों का हवाला देकर छूट की मांग कर रही है, वहीं टाटा मोटर्स इसे ‘अनुचित’ और सुरक्षा के लिए खतरा बता रही है।
मारुति सुजुकी, जो छोटे कारों (909 किलो से कम वजन, 4 मीटर से कम लंबाई और 1200 सीसी इंजन) में 95% से ज्यादा बाजार हिस्सेदारी रखती है, का कहना है कि बिना छूट के ये कारें महंगी हो जाएंगी और आम आदमी की पहुंच से बाहर चली जाएंगी। कंपनी के कॉर्पोरेट अफेयर्स के सीनियर एक्जीक्यूटिव ऑफिसर राहुल भारती ने कहा, “कुछ ‘गैस गजलर’ (बड़े वाहनों) बनाने वाली कंपनियां गलत नैरेटिव फैला रही हैं। वैश्विक स्तर पर 90% से ज्यादा बाजारों में छोटे वाहनों को राहत मिलती है। यह राष्ट्रीय हित में है, न कि किसी कंपनी के।” मारुति ने जोर देकर कहा कि उनके छोटे कारों में पहले से ही 6 एयरबैग और ईएससी जैसे सेफ्टी फीचर्स स्टैंडर्ड हैं, जो कई प्रतिद्वंद्वियों से आगे हैं। कंपनी का तर्क है कि CAFE का मूल उद्देश्य बड़े वाहनों को कुशल बनाना है, न कि छोटे कारों को दंडित करना।
दूसरी ओर, टाटा मोटर्स के पैसेंजर व्हीकल्स एमडी और सीईओ शैलेश चंद्रा ने साफ लफ्जों में विरोध जताया। उन्होंने कहा, “छोटे कारों के लिए वजन या किफायती होने के आधार पर कोई छूट नहीं होनी चाहिए। इससे सुरक्षा फीचर्स प्रभावित होंगे और सस्टेनेबल मोबिलिटी से ध्यान भटकेगा।” टाटा, जो छोटे कार सेगमेंट में 85% बिक्री करती है, का मानना है कि मौजूदा CAFE-2 नियम पहले से ही निष्पक्ष हैं। कंपनी ने सरकार को पत्र लिखकर 909 किलो की नई कैटेगरी को ‘मनमाना’ बताया और कहा कि यह केवल एक खिलाड़ी (मारुति) को फायदा पहुंचाएगा। टाटा ने जोर दिया कि उत्सर्जन लक्ष्य सभी कारों के लिए एकसमान होने चाहिए, ताकि इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर संक्रमण तेज हो।
यह विवाद सिर्फ टाटा-मारुति तक सीमित नहीं। महिंद्रा एंड महिंद्रा, हुंडई, किआ और जेएसडब्ल्यू एमजी मोटर जैसी कंपनियां भी टाटा के साथ हैं। इनका कहना है कि वजन-आधारित छूट से बाजार असंतुलित होगा और भारत का तेल आयात (जो 2025 में 242.4 मिलियन टन पहुंच गया) कम करने का लक्ष्य प्रभावित होगा। वहीं, मारुति को टोयोटा किर्लोस्कर, होंडा और रेनॉल्ट का समर्थन मिला है। सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (SIAM) में चर्चाओं के बावजूद कोई सर्वसम्मति नहीं बनी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह बहस ऑटो इंडस्ट्री की भविष्य की दिशा तय करेगी। अगर छूट मिली, तो छोटे कारों की बिक्री बढ़ेगी, जो कुल पैसेंजर कार बिक्री का 15% हिस्सा है। लेकिन विरोधियों का तर्क है कि इससे सेफ्टी और पर्यावरण लक्ष्य पीछे हटेंगे। सरकार को अब अंतिम फैसला लेना है, जो उद्योग की एकजुटता को परखेगा। फिलहाल, ऑटो के आंगन में धुआं साफ नहीं हो रहा—बल्कि और गहरा हो रहा है।
