काबुल में अफगान-हिंदी रिसर्च सेंटर की स्थापना: भारत-अफगानिस्तान संबंधों में नया अध्याय
काबुल में अफगान-हिंदी रिसर्च सेंटर की स्थापना: भारत-अफगानिस्तान संबंधों में नया अध्याय
तालिबान शासित अफगानिस्तान में भारत के साथ संबंधों को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। अफगानिस्तान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तकी ने घोषणा की है कि काबुल में ‘अफगान-हिंदी रिसर्च सेंटर’ स्थापित किया जाएगा, जो सांस्कृतिक, शैक्षणिक और आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देगा। यह केंद्र हिंदी भाषा, साहित्य, इतिहास और हिंदू-सिख समुदायों की विरासत पर शोध को केंद्रित करेगा, जो अफगानिस्तान के प्राचीन भारतीय उपमहाद्वीप से जुड़े सांस्कृतिक बंधनों को पुनर्जीवित करने का प्रयास है। भारतीय राजदूत करण यादव ने इसे ‘दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक पुल’ बताया है।
यह घोषणा तब आई है जब अक्टूबर 2025 में मुत्तकी की भारत यात्रा के दौरान द्विपक्षीय संबंधों में गति आई। भारत ने अपनी काबुल में तकनीकी मिशन को पूर्ण दूतावास का दर्जा देने की योजना की घोषणा की, जो 2021 में तालिबान के सत्ता हासिल करने के बाद बंद हो गया था। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने 20 एम्बुलेंस सौंपे, स्वास्थ्य और जल परियोजनाओं का वादा किया, तथा मानवीय सहायता जारी रखने की प्रतिबद्धता जताई। अफगान पक्ष ने क्षेत्रीय आतंकवाद की निंदा की और वादा किया कि अफगान मिट्टी का उपयोग भारत-विरोधी समूहों के खिलाफ नहीं होगा। इन चर्चाओं में खनन क्षेत्र में भारतीय कंपनियों के निवेश, शिक्षा कार्यक्रमों और प्रत्यक्ष उड़ानों को बढ़ावा देने पर भी सहमति बनी।
भारत-अफगानिस्तान संबंधों का इतिहास गहरा है। प्राचीन काल में मौर्य साम्राज्य के दौरान अफगान क्षेत्र हिंदू-बौद्ध संस्कृति का केंद्र था। 1950 के मित्रता संधि से लेकर 2011 के रणनीतिक साझेदारी समझौते तक, भारत ने अफगानिस्तान को 3 अरब डॉलर से अधिक की सहायता दी, जिसमें संसद भवन, सड़कें, स्कूल और अस्पताल शामिल हैं। तालिबान शासन के बाद भारत ने दूतावास बंद कर दिया, लेकिन 2022 से तकनीकी टीम भेजी और गेहूं, दवाओं जैसी सहायता जारी रखी। हाल के वर्षों में पाकिस्तान-तालिबान तनाव के बीच भारत ने अवसर का लाभ उठाया, जहां पाकिस्तान के हवाई हमलों ने अफगानिस्तान को नाराज किया।
यह रिसर्च सेंटर कृषि प्रशिक्षण कार्यक्रमों का भी हिस्सा बनेगा, जहां अफगान अधिकारियों को ऑनलाइन-ऑफलाइन कोर्स दिए जाएंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति को मजबूत करेगा, जबकि तालिबान की ‘संतुलित विदेश नीति’ को समर्थन देगा। हालांकि, भारत अभी भी तालिबान को औपचारिक मान्यता नहीं देता, लेकिन व्यावहारिक जुड़ाव बढ़ा रहा है। अफगानिस्तान के हिंदू-सिख अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और महिलाओं के अधिकारों पर सतर्कता बरती जा रही है। दोनों पक्षों के बीच व्यापारिक उड़ानें जल्द शुरू होने की उम्मीद है, जो सूखे मेवे, केसर और फार्मा निर्यात को बढ़ावा देगी।
यह विकास दक्षिण एशिया में स्थिरता की दिशा में सकारात्मक है, लेकिन चुनौतियां बाकी हैं। भारत की यह पहल क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकती है, खासकर चीन और पाकिस्तान के संदर्भ में। फिलहाल, दोनों देशों के अधिकारी अगले दौर की वार्ता की तैयारी में जुटे हैं।
