उत्तराखंड में 90% सरकारी स्कूलों में प्रधानाध्यापक की कमी: फोर्थ क्लास शिक्षक से लेकर प्रिंसिपल तक सब ‘चार्ज’ पर, शिक्षा व्यवस्था पर संकट
उत्तराखंड में 90% सरकारी स्कूलों में प्रधानाध्यापक की कमी: फोर्थ क्लास शिक्षक से लेकर प्रिंसिपल तक सब ‘चार्ज’ पर, शिक्षा व्यवस्था पर संकट
उत्तराखंड की शिक्षा व्यवस्था पर एक गंभीर संकट मंडरा रहा है। राज्य के अधिकांश सरकारी स्कूलों में प्रधानाध्यापक (मुखिया) के पद खाली पड़े हैं, जिसके कारण फोर्थ क्लास के साधारण शिक्षकों से लेकर हाईस्कूल स्तर के प्रिंसिपल तक सभी को दोहरी जिम्मेदारी निभानी पड़ रही है। आंकड़ों के अनुसार, उत्तरकाशी जिले में ही 95% स्कूलों में प्रधानाचार्य या प्रधानाध्यापक के पद रिक्त हैं, जबकि पूरे राज्य में इंटर कालेजों के 89% पद खाली चल रहे हैं। शिक्षा विभाग के सूत्रों का कहना है कि वरिष्ठता और पदोन्नति की प्रक्रिया में देरी के कारण यह समस्या बनी हुई है, जिससे पठन-पाठन प्रक्रिया प्रभावित हो रही है।
उत्तरकाशी जिले के मुख्य शिक्षा अधिकारी अमित कोटियाल ने अमर उजाला को दिए बयान में पुष्टि की कि जिले के 127 राजकीय इंटर कॉलेज और हाईस्कूलों में 95% पद रिक्त हैं। इन स्कूलों में वरिष्ठ शिक्षकों को ही चार्ज सौंपा गया है। इसी तरह, शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत ने विधानसभा में बताया कि राज्य के 1229 स्वीकृत प्रधानाचार्य पदों में से मात्र 126 पर नियमित तैनाती है, बाकी 1103 (लगभग 89%) खाली हैं। हाईस्कूल स्तर पर भी स्थिति भयावह है, जहां 1387 पदों में से केवल 205 पर प्रधानाध्यापक हैं, यानी 1180 (85% से अधिक) पद रिक्त हैं। यह आंकड़े राज्य के कुल 22,000 से अधिक सरकारी स्कूलों की स्थिति को दर्शाते हैं, जहां 90% के करीब संस्थान ‘चार्ज प्रिंसिपल’ पर निर्भर हैं।
इस कमी का सबसे बड़ा असर छात्रों पर पड़ रहा है। वरिष्ठ शिक्षकों को प्रशासनिक कामों में उलझने से क्लासरूम में समय कम मिल पाता है, जिससे पाठ्यक्रम पूरा न होने और छात्रों के प्रदर्शन में गिरावट आ रही है। राजकीय शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष राम सिंह चौहान ने कहा, “पदोन्नति वर्षों से अटकी है। कई शिक्षक रिटायर हो गए, लेकिन प्रमोशन न मिलने से पद खाली पड़े हैं। हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद प्रक्रिया धीमी है।” हाल ही में लोक सेवा आयोग ने 693 रिक्त पदों पर भर्ती के लिए संशोधन जारी किया, जिसमें 50 वर्ष से अधिक उम्र के हाईस्कूल प्रधानाध्यापकों को छूट दी गई और बीएड की बाध्यता टाली गई। लेकिन अभ्यर्थी 31 मई तक आवेदन कर चुके हैं, और भर्ती प्रक्रिया अभी अधर में लटकी है।
शिक्षाविदों का मानना है कि यह समस्या पलायन और ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षकों की कमी से जुड़ी है। चमोली, पिथौरागढ़ जैसे जिलों में भी 80-90% स्कूल प्रभावित हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के 11,375 प्राथमिक विद्यालयों में 2,018 में केवल एक शिक्षक है, जबकि 5,184 में 20 से कम छात्र होने पर भी दो शिक्षक तैनात हैं। विधायक महेश जीना ने हाल ही में सदन में गुस्सा जाहिर करते हुए कहा, “स्कूलों में कितने शिक्षक हैं? यह व्यवस्था बच्चों का भविष्य बर्बाद कर रही है।”
सरकार ने आश्वासन दिया है कि पदोन्नति कोटा 83% से घटाकर 66% करने और विभागीय परीक्षाओं के माध्यम से जल्द भर्ती होगी। लेकिन विपक्ष ने इसे ‘शिक्षा का अपमान’ बताते हुए विशेष सत्र बुलाने की मांग की है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते पद भरें नहीं, तो उत्तराखंड का शिक्षा स्तर राष्ट्रीय औसत से नीचे चला जाएगा। यह मुद्दा न केवल प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करता है, बल्कि पहाड़ी राज्य की शिक्षा क्रांति की राह में बड़ा रोड़ा भी साबित हो रहा है।
