उत्तराखंड में होमस्टे योजना: युवाओं की आत्मनिर्भरता की नई मिसाल, पलायन पर लगाम; आंकड़ों में दिखा असर
उत्तराखंड में होमस्टे योजना: युवाओं की आत्मनिर्भरता की नई मिसाल, पलायन पर लगाम; आंकड़ों में दिखा असर
पहाड़ी राज्य उत्तराखंड, जहां पलायन की समस्या लंबे समय से विकास की राह में सबसे बड़ा रोड़ा बनी हुई है, अब होमस्टे योजना के दम पर नई उम्मीद जगाने लगा है। पर्यटन विभाग द्वारा संचालित यह योजना न केवल स्थानीय युवाओं को स्वरोजगार के अवसर प्रदान कर रही है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत कर पलायन की प्रवृत्ति पर भी ब्रेक लगा रही है। हालिया आंकड़ों से साफ झलकता है कि होमस्टे संचालकों की संख्या में इजाफे के साथ-साथ गांवों में रोजगार के नए द्वार खुल रहे हैं, जिससे युवा शहरों की ओर रुख करने के बजाय अपनी जड़ों से जुड़ रहे हैं।
उत्तराखंड सरकार की ‘होमस्टे योजना’ 2010 से चली आ रही है, लेकिन पिछले पांच वर्षों में इसकी गति तेज हुई है। योजना का मुख्य उद्देश्य पर्यटकों को स्थानीय संस्कृति का अनुभव कराना है, जहां ग्रामीण अपने घरों को होमस्टे में बदलकर अतिथि सत्कार का पारंपरिक अंदाज पेश करते हैं। अधिकतम 6 कमरों वाले होमस्टे के लिए सरकार प्रति कमरा 60,000 रुपये तक की सब्सिडी देती है, जिससे नया निर्माण या नवीनीकरण आसान हो जाता है। इसके अलावा, ‘ट्रेकिंग एट्रैक्शन सेंटर होमस्टे अनुदान योजना’ के तहत ट्रैकिंग रूट्स पर स्थापित होमस्टे को विशेष अनुदान मिलता है। नवीनीकरण के लिए 25,000 रुपये की अतिरिक्त सहायता भी उपलब्ध है। लोन सुविधा के साथ मिलने वाली यह सब्सिडी कुल 15 लाख रुपये तक पहुंच सकती है, जो युवाओं के लिए आकर्षक साबित हो रही है।
आंकड़ों पर नजर डालें तो चमोली जिले में ही यह योजना चमत्कारिक साबित हो रही है। यहां तीन दशक पहले उर्गम घाटी के देवग्राम निवासी राजेंद्र सिंह नेगी ने होमस्टे की शुरुआत की थी, जो आज 1,000 से अधिक होमस्टे का रूप ले चुकी है। जिला पर्यटन विभाग में 750 से ज्यादा संचालकों ने पंजीकरण कराया है। अल्मोड़ा में 400 पंजीकृत होमस्टे हैं, जहां रात्रि का किराया 800 से 3,000 रुपये तक है। राज्य स्तर पर 2025 तक होमस्टे की संख्या 5,000 को पार कर चुकी है, जो 2020 के 2,500 से दोगुनी है। इन होमस्टे से प्रतिवर्ष 50,000 से अधिक युवाओं को प्रत्यक्ष रोजगार मिल रहा है, जिसमें पोर्टर, गाइड और संचालन शामिल है। एक औसत होमस्टे से मासिक आय 50,000 से 1 लाख रुपये तक हो सकती है, जो ग्रामीण युवाओं को आत्मनिर्भर बना रही है।
पलायन पर इसका असर और भी स्पष्ट है। पलायन आयोग द्वारा चिन्हित 474 प्रभावित गांवों में होमस्टे योजना ने रिवर्स माइग्रेशन को बढ़ावा दिया है। चमोली जैसे जिलों में पलायन दर 15-20% घटी है, क्योंकि युवा अब गांव में ही पर्यटन से जुड़कर कमाई कर रहे हैं। राजेंद्र सिंह नेगी जैसे संचालक 15 युवाओं को रोजगार दे रहे हैं, जो पहले शहरों की ओर पलायन कर चुके थे। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की ‘मुख्यमंत्री पलायन रोकथाम योजना’ (एमपीआरवाई) के साथ होमस्टे का तालमेल बिठाकर 2025-26 में 50 राजस्व ग्रामों में आजीविका संवर्द्धन पर फोकस किया जा रहा है। इसमें मनरेगा, एनआरएलएम, कृषि और पशुपालन योजनाओं का समावेश है, जिससे 62,000 लोगों को अप्रत्यक्ष रोजगार मिलने की उम्मीद है।
युवाओं की सफल कहानियां भी प्रेरणा दे रही हैं। रुद्रप्रयाग के सारी गांव में होमस्टे ने पूरे समुदाय को जोड़ा है, जहां 20 युवाओं ने मिलकर 10 होमस्टे शुरू किए। अल्मोड़ा की 25 वर्षीय नेहा जोशी ने सब्सिडी लेकर होमस्टे खोला, जो अब मासिक 75,000 रुपये कमा रही हैं। ज्योतिर्मठ, दशोली और कर्णप्रयाग जैसे क्षेत्रों में क्रेज बढ़ा है। हालांकि, चुनौतियां बाकी हैं—जैसे मौसमी पर्यटन और बुनियादी ढांचे की कमी। पर्यटन विभाग ने 2025 में डिजिटल बुकिंग पोर्टल लॉन्च किया, जिससे बुकिंग 30% बढ़ी।
यह योजना न केवल आर्थिक सशक्तिकरण का प्रतीक है, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने का माध्यम भी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सड़क, बिजली और इंटरनेट जैसी सुविधाएं मजबूत हों, तो पलायन पूरी तरह रुक सकता है। मुख्यमंत्री धामी ने कहा, “होमस्टे से पहाड़ जीवंत हो रहे हैं, युवा आत्मनिर्भर बन रहे हैं।” आने वाले वर्षों में यह योजना राज्य के विकास का नया चैप्टर लिखेगी।
