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पंजाब में बाढ़ का कहर: 12 जिले प्रभावित, लाखों लोग बेघर, आखिर किन कारणों से मची तबाही, डालें नजर

पंजाब में मानसून की तबाही ने विकराल रूप धारण कर लिया है। राज्य के 23 जिलों में से 12 जिले बुरी तरह प्रभावित हैं, जहां 1,000 से अधिक गांव पानी की चपेट में आ चुके हैं। अब तक 29 लोगों की जान जा चुकी है, जबकि करीब 2.56 लाख लोग प्रभावित हुए हैं। बाढ़ के कारण 3 लाख से अधिक लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े हैं, और 96,000 हेक्टेयर से ज्यादा कृषि भूमि डूब चुकी है। मुख्य रूप से गुरदासपुर, अमृतसर, फिरोजपुर, फाजिल्का, पठानकोट, कपूरथला, होशियारपुर, तरन तारन, मनसा, बरनाला, लुधियाना और रूपनगर जैसे जिले सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। राज्य सरकार ने राहत कार्य तेज कर दिए हैं, लेकिन नुकसान का आकलन अभी भी जारी है।

बाढ़ की भयावह स्थिति: गांव डूबे, फसलें बर्बाद

पंजाब में बाढ़ की स्थिति गंभीर बनी हुई है। राज्य के 23 में से 12 जिले बुरी तरह प्रभावित हैं, जिससे 1,044 से अधिक गांव चपेट में हैं। गुरदासपुर में सबसे ज्यादा 321 गांव प्रभावित हुए हैं, उसके बाद अमृतसर (88), फिरोजपुर (76), फाजिल्का (72), पठानकोट (82), कपूरथला (115) और होशियारपुर (94)। बाढ़ से 2.32 लाख एकड़ से ज्यादा कृषि भूमि डूब चुकी है, जिसमें धान की फसल को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। किसानों का कहना है कि कटाई से ठीक पहले यह तबाही उनकी कमर तोड़ देगी। पशुधन को भी भारी नुकसान हुआ है, और कई जगहों पर बिजली-पानी की आपूर्ति बाधित हो गई है।

राहत और बचाव कार्य में भारतीय सेना, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, बीएसएफ और स्थानीय प्रशासन दिन-रात जुटे हैं। अब तक 15,688 लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया गया है, जिसमें गुरदासपुर से 5,549, फिरोजपुर से 3,321 और फाजिल्का से 2,049 लोग शामिल हैं। 129 राहत शिविरों में 7,144 लोग शरण ले चुके हैं। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने सोमवार को प्रभावित इलाकों का दौरा किया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से 60,000 करोड़ रुपये की विशेष सहायता राशि की मांग की। उन्होंने कहा, “यह पंजाब की दशकों की सबसे भयानक बाढ़ है, केंद्र सरकार को तुरंत मदद करनी चाहिए।” स्कूलों की छुट्टियां 3 सितंबर तक बढ़ा दी गई हैं, और फसल नुकसान का आकलन ‘गिरदावरी’ के जरिए किया जा रहा है।

इन पांच कारणों से राज्य में मची तबाही

पंजाब में बाढ़ का कहर असामान्य मानसून वर्षा और मानवीय कारकों का नतीजा है। विशेषज्ञों के अनुसार, ये पांच मुख्य कारण हैं जिन्होंने राज्य को तबाह कर दिया:

1. भारी मानसून वर्षा: हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में असामान्य रूप से भारी बारिश हुई, जिससे नदियों का जलस्तर तेजी से बढ़ गया। अगस्त में पंजाब को सामान्य से 26% ज्यादा बारिश मिली, जो बाढ़ का प्राथमिक कारण बनी।

2. नदियों का उफान: सतलुज, ब्यास, रावी और घग्गर जैसी नदियां अपने किनारों से बाहर बहने लगीं। गुरदासपुर और कपूरथला में बांधों के टूटने से सैकड़ों गांव डूब गए। रावी नदी की चौड़ाई 10 गुना बढ़ गई, जिससे घर-खेत सब पानी में समा गए।

3. डैम से अतिरिक्त पानी छोड़ा जाना: पोंग, रंजीत सागर और भाखड़ा जैसे डैम पूर्ण क्षमता पर पहुंच गए, जिससे डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों में अतिरिक्त पानी छोड़ा गया। भाखड़ा डैम का जलस्तर अधिकतम सीमा से सिर्फ 9 फीट नीचे था, और पोंग डैम अधिकतम से ऊपर चला गया। इससे निचले इलाकों में बाढ़ तेज हो गई।

4. शहरी जल निकासी की विफलता: शहरों में खराब ड्रेनेज सिस्टम के कारण पानी जमा हो गया। जिरकपुर और डेरा बास्सी जैसे इलाकों में नाले भरे होने से जलभराव बढ़ा, जिससे राहत कार्य बाधित हुए।

5. बाढ़ क्षेत्रों पर अतिक्रमण: प्राकृतिक जल अवशोषण क्षेत्रों पर निर्माण कार्यों से पानी का प्रबंधन प्रभावित हुआ। दोआबा क्षेत्र में खेतों और गांवों के पास बाढ़ के मैदानों पर अवैध निर्माण ने नुकसान को बढ़ावा दिया। जलवायु परिवर्तन ने भी मानसून को और घातक बना दिया।

राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव

यह बाढ़ 1988 के बाद की सबसे खराब आपदा है, जिससे पंजाब की अर्थव्यवस्था को करीब 60,000 करोड़ का नुकसान होने का अनुमान है। किसान संगठन आंदोलन की चेतावनी दे रहे हैं, जबकि खालसा एड जैसी एनजीओ राहत सामग्री बांट रही हैं। पूर्व सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह ने भी केंद्र से विशेष पैकेज की मांग की है। मौसम विभाग ने पीली चेतावनी जारी की है, और बाढ़ का पानी अभी भी कम होने में समय लगेगा।

राज्य सरकार ने सभी एमएलए को एक महीने का वेतन बाढ़ राहत के लिए दान करने का फैसला किया है। प्रधानमंत्री मोदी ने सीएम मान से बात की और हर संभव मदद का आश्वासन दिया। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि केंद्र राज्य को नजरअंदाज कर रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि बाढ़ प्रबंधन के लिए मजबूत बुनियादी ढांचे और जलवायु अनुकूलन की जरूरत है, वरना भविष्य में ऐसी आपदाएं बढ़ेंगी।

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