महाराष्ट्र की महायुति में अंदरूनी खींचतान: मराठा आरक्षण, मुख्यमंत्री पद की दावेदारी और विभागों के बंटवारे पर तेज हुआ शक्ति-संघर्ष
महाराष्ट्र की महायुति में अंदरूनी खींचतान: मराठा आरक्षण, मुख्यमंत्री पद की दावेदारी और विभागों के बंटवारे पर तेज हुआ शक्ति-संघर्ष
महाराष्ट्र की सत्ताधारी महायुति (Mahayuti) गठबंधन सतह पर भले ही मजबूत नजर आ रहा हो, लेकिन इसके भीतर चल रही राजनीतिक हलचल ने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। मराठा आरक्षण से जुड़ी विवादित ऑडियो क्लिप, एकनाथ शिंदे को फिर से मुख्यमंत्री बनाने की सार्वजनिक मांग, कोंकण में सहयोगी दलों के बीच वर्चस्व की लड़ाई, विधान परिषद चुनावों में आपसी भिड़ंत और वित्त विभाग को लेकर अजित पवार गुट का बढ़ता दबाव—यह सब इस बात का संकेत है कि गठबंधन के भीतर प्रभाव, पद और प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर एक शांत ‘कोल्ड वॉर’ छिड़ी हुई है।
1. मराठा आरक्षण आंदोलन और एक ऑडियो क्लिप का सियासी भूचाल:
500 करोड़ के लेन-देन के दावे: मराठा आरक्षण आंदोलन के नेता मनोज जरांगे पाटिल द्वारा सार्वजनिक की गई एक कथित ऑडियो क्लिप में उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे से जुड़े 500 करोड़ रुपये के लेन-देन का दावा किया गया। साथ ही, बीजेपी की सोशल मीडिया इकाई पर आंदोलन को कमजोर करने की साजिश के आरोप भी लगे।
फडणवीस द्वारा SIT जांच: इस संवेदनशील मामले में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने मुंबई पुलिस के जरिए एसआईटी (SIT) जांच के आदेश देकर एक बार फिर प्रशासनिक और राजनीतिक नियंत्रण अपने हाथ में रखने का कड़ा संदेश दिया है।
2. मुख्यमंत्री पद पर खुली दावेदारी और ‘जूनियर पार्टनर’ बनने से इंकार:
दशहरा रैली के बयान: दशहरा रैली के दौरान शिवसेना (शिंदे गुट) के वरिष्ठ नेताओं (रामदास कदम और गुलाबराव पाटिल) ने खुलकर एकनाथ शिंदे को भविष्य का मुख्यमंत्री बताया।
बीजेपी को संदेश: राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान केवल प्रशंसा नहीं, बल्कि बीजेपी को यह स्पष्ट संदेश है कि शिंदे गुट खुद को लंबे समय तक ‘जूनियर पार्टनर’ के रूप में स्वीकार नहीं करेगा और भविष्य के नेतृत्व पर अपना दावा बनाए रखेगा।
3. कोंकण क्षेत्र और स्थानीय चुनावों में खुलकर सामने आई बगावत:
कोंकण में वर्चस्व की जंग: कोंकण क्षेत्र में शिवसेना और अजित पवार गुट (NCP) के नेताओं के बीच गार्डियन मिनिस्टर (पालक मंत्री) पद, विकास निधि और स्थानीय वर्चस्व को लेकर विवाद गहराया है। भारतशेठ गोगावले, महेंद्र थोरवे और महेंद्र दलवी जैसे नेता एनसपी सांसद सुनील तटकरे के खिलाफ सार्वजनिक नाराजगी जता चुके हैं।
विधान परिषद चुनाव में आपसी भिड़ंत: हालिया विधान परिषद चुनावों (विशेषकर पुणे शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र) में महायुति के सहयोगी दल एक-दूसरे के आमने-सामने खड़े नजर आए, जिससे यह साफ हुआ कि स्थानीय स्तर पर नेता सामूहिक रणनीति की बजाय अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुटे हैं।
4. वित्त विभाग पर रस्साकशी और मंत्रालयों की खींचतान:
अजित पवार गुट का दबाव: आगामी शीतकालीन सत्र और संभावित मंत्रिमंडल विस्तार से पहले अजित पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी ने वित्त विभाग पर अपना दावा और तेज कर दिया है। सुनेत्रा पवार के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल की मुख्यमंत्री फडणवीस से मुलाकात और छगन भुजबल के बयानों से साफ है कि सहयोगी दल सत्ता और प्रशासनिक नियंत्रण के सबसे बड़े स्रोतों पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहते हैं।
निष्कर्ष:
यह तमाम घटनाएं (ऑडियो क्लिप विवाद, सीएम चेहरे की बहस, क्षेत्रीय संघर्ष और मंत्रालयों के लिए दावे) इस बात का संकेत हैं कि महायुति एक बेहद संवेदनशील दौर से गुजर रही है। हालांकि फिलहाल गठबंधन सरकार पर कोई तत्काल खतरा नहीं है, लेकिन आने वाले महीनों में होने वाला मंत्रिमंडल विस्तार और विभागों का बंटवारा यह तय करेगा कि यह अंदरूनी तनाव शांत होता है या महाराष्ट्र की राजनीति में किसी बड़े शक्ति-संतुलन (Power Struggle) को जन्म देता है।

