ISRO की ‘सबसे सस्ती’ स्पेस लॉन्चिंग पर उठे सवाल, नई स्टडी ने किया चौंकाने वाला दावा
ISRO की ‘सबसे सस्ती’ स्पेस लॉन्चिंग पर उठे सवाल, नई स्टडी ने किया चौंकाने वाला दावा
नई दिल्ली: भारत आज 23 अगस्त को अपना तीसरा नेशनल स्पेस डे मना रहा है। इसी बीच कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी और इटली के पोलिटेक्निको दी टोरिनो के शोधकर्ताओं की एक नई स्टडी ने भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की लागत को लेकर बहस छेड़ दी है। स्टडी में दावा किया गया है कि प्रति किलोग्राम पेलोड को लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) तक पहुंचाने की लागत के आधार पर भारत प्रमुख अंतरिक्ष शक्तियों में सबसे महंगा है।
Economics Letters में प्रकाशित इस रिसर्च में 1960 से 2025 के बीच हुए 6,740 से अधिक रॉकेट लॉन्च के डेटा का विश्लेषण किया गया है।
भारत की लागत अमेरिका से करीब चार गुना ज्यादा?
स्टडी के मुताबिक, 2025 में LEO तक एक किलोग्राम पेलोड पहुंचाने की औसत लागत भारत में करीब 13,302 डॉलर प्रति किलोग्राम थी। वहीं अमेरिका में यही लागत करीब 3,225 डॉलर प्रति किलोग्राम बताई गई है।
रिपोर्ट में प्रमुख देशों की अनुमानित लागत इस प्रकार बताई गई है:
अमेरिका: 3,225 डॉलर प्रति किलोग्राम
जापान: 5,287 डॉलर प्रति किलोग्राम
चीन: 5,809 डॉलर प्रति किलोग्राम
रूस: 6,682 डॉलर प्रति किलोग्राम
यूरोप: 9,897 डॉलर प्रति किलोग्राम
भारत: 13,302 डॉलर प्रति किलोग्राम
स्टडी के अनुसार अंतरराष्ट्रीय औसत करीब 3,868 डॉलर प्रति किलोग्राम रहा।
लेकिन भारत को सबसे महंगा बताने की वजह क्या है?
शोधकर्ताओं ने खुद माना है कि यह निष्कर्ष पहली नजर में हैरान करने वाला लग सकता है। इसकी एक बड़ी वजह भारतीय लॉन्च व्हीकल की कम पेलोड क्षमता बताई गई है।
यानी किसी मिशन की कुल लागत कम होने के बावजूद अगर उसमें अपेक्षाकृत कम वजन का पेलोड भेजा जाता है, तो प्रति किलोग्राम लागत ज्यादा दिखाई दे सकती है। इसलिए केवल इस एक पैमाने से किसी देश के पूरे स्पेस प्रोग्राम को महंगा या सस्ता बताना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता।
ISRO ने स्टडी के आंकड़ों पर उठाए सवाल
स्टडी सामने आने के बाद ISRO प्रमुख डॉ. वी. नारायणन ने इसके निष्कर्षों को खारिज करते हुए कहा कि इसमें गलत आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है।
पूर्व ISRO प्रमुख डॉ. एस. सोमनाथ ने भी केवल प्रति किलोग्राम लागत के आधार पर तुलना करने को उचित नहीं माना। उनका तर्क है कि अमेरिका के Falcon 9 की कम प्रति-किलोग्राम लागत के पीछे उसका बड़ा पैमाना, बड़ी पेलोड क्षमता और लगातार बढ़ती लॉन्च संख्या महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
उन्होंने यह भी माना कि भारतीय लॉन्चर दुनिया के सबसे सस्ते नहीं हैं, लेकिन उन्हें अत्यधिक महंगा कहना भी उचित नहीं होगा।
SpaceX ने बदल दी लॉन्चिंग की अर्थव्यवस्था
स्टडी में अमेरिका की लागत बढ़त के पीछे SpaceX और उसके reusable Falcon 9 रॉकेट को अहम वजह बताया गया है। बार-बार इस्तेमाल होने वाले रॉकेटों ने लॉन्च की औसत लागत और लॉन्च की आवृत्ति, दोनों पर बड़ा असर डाला है।
भारत ने भी Reusable Launch Vehicle तकनीक के कई परीक्षण किए हैं। हालांकि अभी तक कोई पुन: उपयोग योग्य ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल नियमित सेवा में नहीं आया है। प्रस्तावित NGLV में भी reusable तकनीक को महत्वपूर्ण भूमिका दी गई है।
क्या ‘भारत का स्पेस मिशन सबसे सस्ता है’ दावा गलत है?
पूरी तरह ऐसा कहना भी जल्दबाजी होगी। भारत की अंतरिक्ष उपलब्धियों को अक्सर उसके सीमित संसाधनों और मिशन की कुल लागत के संदर्भ में देखा जाता है। वहीं नई स्टडी प्रति किलोग्राम पेलोड लागत को आधार बनाती है।
इसलिए दोनों बातों में अंतर समझना जरूरी है—कम कुल मिशन लागत और कम प्रति-किलोग्राम लॉन्च लागत एक ही चीज नहीं हैं।
भारत के सामने अब चुनौती केवल कम लागत वाले मिशन बनाने की नहीं, बल्कि लॉन्च की संख्या बढ़ाने, बड़े पेलोड ले जाने, निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने और reusable रॉकेट तकनीक विकसित करने की भी है।
नई स्टडी ने ISRO की उपलब्धियों को खारिज नहीं किया है, लेकिन यह जरूर संकेत दिया है कि तेजी से बदलते वैश्विक स्पेस मार्केट में भारत को अगली पीढ़ी की लॉन्च तकनीक और बड़े पैमाने के ऑपरेशन पर ज्यादा जोर देना होगा।
