“इस्तीफा दे दिया… लेकिन समस्या कहाँ गई? धर्मेंद्र प्रधान पर दबाव की राजनीति ने सिस्टम को नहीं, सिर्फ एक मंत्री को निशाना बनाया”
“इस्तीफा दे दिया… लेकिन समस्या कहाँ गई? धर्मेंद्र प्रधान पर दबाव की राजनीति ने सिस्टम को नहीं, सिर्फ एक मंत्री को निशाना बनाया”
नई दिल्ली, 25 जुलाई 2026
शनिवार को जब धर्मेंद्र प्रधान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना इस्तीफा सौंपा, तो जंतर मंतर पर जश्न मनाया गया। CJP ने इसे “छात्र शक्ति की जीत” करार दिया। विपक्ष ने इसे सरकार की हार बताया। लेकिन सवाल वही खड़ा है जो हर बड़े इस्तीफे के बाद उठता है — क्या असल समस्या हल हुई?
जवाब साफ है। नहीं।
इस्तीफा कितना जायज था?
धर्मेंद्र प्रधान पर आरोप यह था कि NEET-UG 2026 पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था की नाकामी की जिम्मेदारी उनकी है। लेकिन हकीकत थोड़ी अलग है।
पेपर लीक कोई नया अपराध नहीं है। पिछले कई सालों से NTA और राज्य बोर्ड की परीक्षाओं में लीक के मामले सामने आते रहे हैं। 2024 में भी बड़े पैमाने पर लीक हुए थे। तब भी शिक्षा मंत्री वही थे। तब इस्तीफे की मांग क्यों नहीं उठी इतनी जोर से? क्योंकि तब कोई संगठित आंदोलन नहीं था, कोई 72 घंटे का अल्टीमेटम नहीं था, और न ही राजनीतिक मौसम ऐसा था।
धर्मेंद्र प्रधान ने खुद कहा कि वे छात्रों के भविष्य को और प्रभावित नहीं होने देना चाहते। उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी ली। लेकिन नैतिक जिम्मेदारी और प्रशासनिक दोष में फर्क होता है। क्या प्रधान ने खुद पेपर लीक करवाया? क्या उन्होंने NTA को निर्देश दिया कि सुरक्षा व्यवस्था ढीली रखी जाए? कोई सबूत नहीं है। असली समस्या NTA की संरचना, ठेकेदारों पर निर्भरता, और परीक्षा सुरक्षा की पुरानी व्यवस्था में है। एक मंत्री बदलने से ये समस्याएं गायब नहीं होतीं।
इस्तीफे से क्या समाधान निकला?
इस्तीफे के तुरंत बाद सरकार ने कुछ कदम उठाए — NTA के 47 अधिकारियों को हटाया, पेपर लीक के खिलाफ सख्त कानून का बिल आगे बढ़ाया, और मुआवजे का ऐलान किया। लेकिन ये कदम इस्तीफे से पहले भी लिए जा सकते थे, और लिए जा रहे थे।
परीक्षा व्यवस्था में सुधार की प्रक्रिया पहले से चल रही थी।
फास्ट ट्रैक कोर्ट और NTA के पुनर्गठन की बात पहले से हो रही थी।
छात्रों के परिवारों को मुआवजा देने का फैसला भी इस्तीफे की शर्त नहीं था।
इस्तीफे ने सिर्फ एक चीज हासिल की — राजनीतिक दबाव कम हुआ। संसद में विपक्ष का मुद्दा छिन गया, जंतर मंतर खाली हो गया, और CJP ने आंदोलन समाप्त कर दिया। लेकिन परीक्षा की विश्वसनीयता वापस आई? नहीं। अगली NEET में लीक का खतरा खत्म हुआ? नहीं। छात्रों का भरोसा लौटा? अभी नहीं।
धर्मेंद्र प्रधान का पक्ष
धर्मेंद्र प्रधान कोई नौसिखिया मंत्री नहीं थे। वे लंबे समय से शिक्षा और कौशल विकास के क्षेत्र में काम कर रहे थे। उनके कार्यकाल में नेशनल एजुकेशन पॉलिसी लागू हुई, कई नए संस्थान खुले, और डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा मिला। पेपर लीक जैसी समस्याएं व्यवस्थागत हैं, व्यक्तिगत नहीं।
दबाव की राजनीति में अक्सर असली मुद्दे दब जाते हैं। CJP ने “एक ही मांग” पर अड़ने का फैसला किया। सरकार ने राजनीतिक नुकसान से बचने के लिए मंत्री को बलि का बकरा बना लिया। नतीजा यह हुआ कि समस्या जस की तस रह गई, सिर्फ चेहरा बदल गया।
प्रह्लाद जोशी को अतिरिक्त प्रभार मिला है। क्या वे जादुई तरीके से NTA को ठीक कर देंगे? शायद नहीं। क्योंकि समस्या व्यक्ति में नहीं, सिस्टम में है।
असल सवाल अब क्या है?
इस्तीफे के बाद अब असली बहस होनी चाहिए —
NTA को कैसे स्वतंत्र और मजबूत बनाया जाए?
परीक्षा सुरक्षा में तकनीक और पारदर्शिता कैसे लाई जाए?
लीक करने वालों को कैसे सख्त सजा दी जाए, न कि सिर्फ मंत्री बदल दिए जाएं?
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा छात्रों की आवाज का सम्मान था। लेकिन यह समाधान नहीं था। समाधान तब आएगा जब सिस्टम बदलेगा, न कि जब एक और मंत्री कुर्सी छोड़ देगा।
आज जंतर मंतर खाली है। लेकिन अगर अगली परीक्षा में फिर लीक हुआ, तो वही सवाल फिर उठेगा — इस बार किसका इस्तीफा मांगा जाएगा?
