उत्तराखंड वन विभाग में बड़ा प्रशासनिक विवाद: वरिष्ठ IFS अधिकारी की पदोन्नति पर उठे सवाल; संजीव चतुर्वेदी ने मुख्य सचिव को भेजा लीगल नोटिस
उत्तराखंड वन विभाग में बड़ा प्रशासनिक विवाद: वरिष्ठ IFS अधिकारी की पदोन्नति पर उठे सवाल; संजीव चतुर्वेदी ने मुख्य सचिव को भेजा लीगल नोटिस
देहरादून: उत्तराखंड वन विभाग में नियमों को दरकिनार कर शीर्ष पदों पर पदोन्नति दिए जाने का एक गंभीर मामला प्रकाश में आया है। वरिष्ठ आईएफएस (IFS) अधिकारी रंजन कुमार मिश्रा की लेवल-17 (एपेक्स स्केल) पर हुई प्रोमोशन को लेकर प्रशासनिक और शासनिक हलकों में हड़कंप मच गया है। प्रसिद्ध IFS अधिकारी संजीव चतुर्वेदी ने इस संबंध में उत्तराखंड के मुख्य सचिव को एक कड़ा कानूनी नोटिस (Legal Notice) जारी कर कई गंभीर आरोप लगाए हैं।
1. अचल संपत्ति विवरण (IPR) दाखिल न करने का आरोप
नियमों की अनदेखी: कानूनी नोटिस में ‘भारतीय वन सेवा (वेतन) नियम, 2016’ का हवाला देते हुए स्पष्ट किया गया है कि प्रत्येक आईएफएस अधिकारी के लिए हर साल 31 जनवरी तक अपनी अचल संपत्ति का ब्योरा (IPR) जमा करना अनिवार्य है। IPR दाखिल न होने पर अगली वेतन वृद्धि या पदोन्नति रोक दी जाती है।
9 सालों से IPR गायब: केंद्रीय सरकारी (DoPT) IPR स्टेटस मॉड्यूल के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2017 से लेकर 2026 तक रंजन कुमार मिश्रा द्वारा कोई भी अचल संपत्ति विवरण दर्ज नहीं कराया गया है।
2. चयन समिति की कार्यप्रणाली पर सवाल
विभागीय कार्रवाई के बजाय प्रोमोशन: DoPT के नियमों के अनुसार IPR दाखिल न करने पर संबंधित अधिकारी के खिलाफ विभागीय चार्जशीट और अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की जानी चाहिए थी।
इंटीग्रिटी सर्टिफिकेट जारी: आरोप है कि दिसंबर 2025 में आयोजित चयन समिति की बैठक में नियमों को नजरअंदाज करते हुए उन्हें ‘क्लियरेंस’ और ‘इंटीग्रिटी सर्टिफिकेट’ (Integrity Certificate) जारी कर दिया गया, जिससे उनकी सर्वोच्च पद पर पदोन्नति का रास्ता साफ हुआ।
3. CBI और ED जांच की मांग तथा 45 दिन का अल्टीमेटम
स्वतंत्र जांच एजेंसियों की मांग: मुख्य सचिव को भेजे गए नोटिस में मांग की गई है कि रंजन कुमार मिश्रा की संपत्तियों की CBI, प्रवर्तन निदेशालय (ED) और आयकर विभाग (Income Tax) से स्वतंत्र जांच कराई जाए।
पदोन्नति की समीक्षा: इस गलत पदोन्नति की तत्काल समीक्षा करने और इसमें शामिल जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग की गई है।
कानूनी कार्रवाई की चेतावनी: नोटिस में चेतावनी दी गई है कि यदि 45 दिनों के भीतर शासन द्वारा इस मामले पर सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो इस पूरे प्रकरण को अदालत में चुनौती दी जाएगी।
