Friday, July 3, 2026
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अंकिता भंडारी हत्याकांड: सीबीआई (CBI) जांच में देरी पर फूटा गुस्सा, देहरादून में आंदोलनकारियों ने कार्यालय का घेराव कर की ‘तालाबंदी’

अंकिता भंडारी हत्याकांड: सीबीआई (CBI) जांच में देरी पर फूटा गुस्सा, देहरादून में आंदोलनकारियों ने कार्यालय का घेराव कर की ‘तालाबंदी’

​अंकिता भंडारी हत्याकांड में सीबीआई जांच की धीमी रफ्तार को लेकर एक बार फिर आक्रोश बढ़ गया है। गुरुवार (2 जुलाई 2026) को भारी बारिश के बीच ‘अंकिता न्याय यात्रा संयुक्त संघर्ष मंच’ से जुड़े दर्जनों कार्यकर्ताओं और महिलाओं ने देहरादून के सीमा द्वार स्थित सीबीआई कार्यालय का जोरदार घेराव किया और जमकर नारेबाजी की।

​बैरिकेडिंग तोड़कर की ‘प्रतीकात्मक तालाबंदी’

​आंदोलनकारियों के विरोध-प्रदर्शन को देखते हुए पुलिस ने सीबीआई कार्यालय के मुख्य द्वार पर भारी बैरिकेडिंग लगा रखी थी और उन्हें रोकने का प्रयास किया। इसके बावजूद, प्रदर्शनकारी पीछे नहीं हटे। कुछ आंदोलनकारी महिलाओं ने सूझबूझ दिखाते हुए सीबीआई कार्यालय के दूसरे प्रवेश द्वार की ओर रुख किया और वहां पहुंचकर प्रतीकात्मक रूप से ‘तालाबंदी’ कर अपना विरोध दर्ज कराया।

​मंच ने उठाए कई तीखे सवाल, अधिकारियों से हुई वार्ता

​घेराव के दौरान संयुक्त संघर्ष मंच के प्रतिनिधिमंडल और सीबीआई के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच कार्यालय के भीतर वार्ता भी हुई। मंच के नेता मोहित डिमरी ने जांच की प्रगति पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए कहा:

​6 महीने बाद भी स्टेटस क्या?: इस मामले की जांच सीबीआई को सौंपे हुए करीब 6 महीने का समय बीतने जा रहा है, लेकिन जांच वर्तमान में किस स्तर पर है, यह किसी को नहीं पता। पहले भी पूछने पर अधिकारियों ने कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी।

​कौन है वो वीआईपी (VIP)?: अंकिता प्रकरण में शुरुआत से ही जिस ‘कथित वीआईपी’ का जिक्र आ रहा है, उसका नाम अब तक सामने क्यों नहीं आया और क्या सीबीआई ने उससे पूछताछ की?

​साक्ष्य मिटाने वालों पर कार्रवाई कब?: घटना के तुरंत बाद रिजॉर्ट पर बुलडोजर चलाकर महत्वपूर्ण सबूतों और साक्ष्यों को मिटाने की कोशिश करने वालों पर अब तक कोई ठोस कानूनी एक्शन क्यों नहीं लिया गया?

​माता-पिता से दूरी क्यों?: जांच शुरू होने के 6 महीने बाद भी सीबीआई ने अंकिता भंडारी के माता-पिता को बयान दर्ज करने या चर्चा के लिए क्यों नहीं बुलाया?

​”यह उत्तराखंड की बेटियों की सुरक्षा की लड़ाई है”

प्रदर्शन में शामिल महिला कार्यकर्ताओं ने हुंकार भरते हुए कहा कि यह आंदोलन अब सिर्फ अंकिता को न्याय दिलाने तक सीमित नहीं है। यह देवभूमि उत्तराखंड की हर महिला की सुरक्षा, सरकारी तंत्र की लोकतांत्रिक जवाबदेही और केंद्रीय जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता को बचाने की एक बड़ी और निर्णायक लड़ाई बन चुकी है। जब तक इन सवालों के पारदर्शी जवाब नहीं मिलते, उनका संघर्ष जारी रहेगा।

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