नकली ब्रांड और फ्लेवर चोरी रोकने के लिए भारतीय सिंगल माल्ट व्हिस्की को मिला विशेष ट्रेडमार्क, IMWA ने जारी किए कड़े नियम
नकली ब्रांड और फ्लेवर चोरी रोकने के लिए भारतीय सिंगल माल्ट व्हिस्की को मिला विशेष ट्रेडमार्क, IMWA ने जारी किए कड़े नियम
नई दिल्ली: पिछले 3-4 सालों में अपनी बेहतरीन क्वालिटी और अनोखे स्वाद के दम पर दुनिया भर में धूम मचाने वाली भारतीय सिंगल माल्ट व्हिस्की की सुरक्षा के लिए एक बड़ा कदम उठाया गया है। इंडियन माल्ट व्हिस्की एसोसिएशन (IMWA) ने बुधवार को भारतीय सिंगल माल्ट व्हिस्की के लिए एक खास ‘सर्टिफिकेशन ट्रेडमार्क’ (होलोग्राम के रूप में) शुरू करने की घोषणा की है। इस कदम का मुख्य उद्देश्य भारतीय व्हिस्की की अनूठी खासियत और क्वालिटी स्टैंडर्ड को बनाए रखना है, ताकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कोई इसका नकली ब्रांड न बना सके और न ही इसके अनूठे फ्लेवर को चुरा पाए।
हाल के दिनों में अमृत (Amrut), पॉल जॉन (Paul John), रामपुर (Rampur) और इंद्री (Indri) जैसे भारतीय ब्रांडों ने वैश्विक शराब बाजार में बड़े-बड़े विदेशी प्रीमियम ब्रांड्स को पीछे छोड़ दिया है। वहीं, ‘गोडावण’ जैसे भारतीय सिंगल माल्ट ब्रांड अब तक 125 से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय अवार्ड जीत चुके हैं।
भारत में क्यों अलग और लाजवाब होता है व्हिस्की का स्वाद?
जलवायु का ‘प्रेशर कुकर’ प्रभाव: स्कॉटलैंड की ठंडी जलवायु में व्हिस्की को पूरी तरह तैयार होने में 12 से 18 साल का लंबा समय लगता है। इसके विपरीत, भारत के गोवा, बेंगलुरु या राजस्थान जैसी जगहों की तेज गर्मी और नमी एक प्रेशर कुकर की तरह काम करती है। गर्मी के कारण स्पिरिट बहुत तेजी से लकड़ी के बैरल (Oak Casks) के भीतर तक जाती और बाहर निकलती है। इससे भारत में मात्र 5 से 7 साल में ही वह गहराई, गाढ़ा रंग और परिपक्व स्वाद मिल जाता है, जो स्कॉच व्हिस्की में 15 से 20 साल में आता है।
अद्भुत ‘एंजल्स शेयर’ (Angel’s Share): बैरल में रखी व्हिस्की का जो हिस्सा हर साल हवा में उड़ जाता है, उसे ‘एंजल्स शेयर’ कहते हैं। स्कॉटलैंड में यह नुकसान सालाना केवल 2% होता है, जबकि भारत में अत्यधिक गर्मी के कारण 8 से 12% तक व्हिस्की उड़ जाती है। लेकिन इसके बाद जो व्हिस्की बचती है, वह अविश्वसनीय रूप से बेहद गाढ़ी, रिच और फ्लेवर से भरपूर होती है।
अनोखी स्वदेशी तकनीक और भारतीय फ्लेवर का जादू
सिक्स रो जौ (Six-Row Barley) का इस्तेमाल: पारंपरिक स्कॉच आमतौर पर ‘टू-रो’ जौ से बनती है, जो हल्की और मीठी होती है। इसके उलट, भारतीय कंपनियां (जैसे इंद्री, पॉल जॉन, अमृत, गोडावण) उत्तर भारत और हिमालय की तलहटी में उगने वाले ‘सिक्स-रो’ जौ का इस्तेमाल करती हैं। इस जौ में प्रोटीन और एंजाइम की मात्रा अधिक होने से व्हिस्की का स्वाद काफी तैलीय, गाढ़ा और बेहद अलग होता है।
भारतीय मसालों और फलों के नोट्स: भारतीय व्हिस्की में एक खास मसालेदार टच देने के लिए दालचीनी, लौंग, काली मिर्च और अदरक का इस्तेमाल किया जाता है। साथ ही इसमें आम, लीची, अनानास जैसे मौसमी फलों, शहद और डार्क चॉकलेट के नोट्स भी मिलते हैं।
अनोखे बैरल का प्रयोग: भारतीय डिस्टिलरीज केवल पारंपरिक बोर्बन या शेरी पीपों तक सीमित नहीं हैं। कुछ ब्रांड अपनी व्हिस्की को नासिक की भारतीय वाइन के बैरल और यहाँ तक कि महुआ के पीपों में फिनिश (मैच्योर) करने जैसे अनोखे प्रयोग कर रहे हैं।
ट्रेडमार्क पाने के लिए पूरे करने होंगे ये कड़े नियम
IMWA के बयान के अनुसार, यह होलोग्राफिक ट्रेडमार्क व्हिस्की के असली होने का पुख्ता सबूत होगा। यह केवल उन्हीं निर्माता कंपनियों को दिया जाएगा जो एसोसिएशन के कड़े प्रोडक्शन मानकों पर खरी उतरेंगी। इसके लिए निम्नलिखित नियम तय किए गए हैं:
100% माल्टेड जौ: व्हिस्की बनाने में केवल माल्टेड जौ का इस्तेमाल होगा, किसी भी प्रकार के गुड़ या न्यूट्रल स्पिरिट की मिलावट प्रतिबंधित होगी।
सिंगल डिस्टिलरी: पूरी व्हिस्की भारत में स्थित एक ही डिस्टिलरी के भीतर उत्पादित होनी चाहिए।
कॉपर पॉट स्टिल्स: डिस्टिलेशन की प्रक्रिया केवल कॉपर पॉट स्टिल्स में ही की जाएगी।
मैच्योरेशन की सीमा: व्हिस्की को 700 लीटर से कम क्षमता वाले ओक (Oak) के पीपों में कम से कम तीन साल तक मैच्योर करना अनिवार्य होगा।
नो एक्सटर्नल फ्लेवर: मैशिंग, डिस्टिलेशन, मैच्योरेशन और बॉटलिंग की पूरी प्रक्रिया भारत के भीतर ही होगी और इसमें किसी भी बाहरी फ्लेवर एजेंट को मिलाने की इजाजत नहीं होगी।
