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AI के खिलाफ बढ़ रहा विरोध: डेटा सेंटरों पर उठ रहे गंभीर सवाल

AI के खिलाफ बढ़ रहा विरोध: डेटा सेंटरों पर उठ रहे गंभीर सवाल

दुनिया भर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की तेज रफ्तार से बढ़ती लोकप्रियता के साथ इसके पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों को लेकर विरोध भी तेज हो गया है। खासतौर पर AI ट्रेनिंग और ऑपरेशन के लिए बने विशाल डेटा सेंटरों पर ऊर्जा खपत, पानी की बर्बादी और स्थानीय समुदायों पर पड़ने वाले असर को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

जनता का बढ़ता आक्रोश

हालिया Gallup सर्वे के अनुसार, अमेरिका में लगभग 7 में से 7 लोगों ने अपने इलाके में बड़े AI डेटा सेंटर बनाने का विरोध किया है। मुख्य चिंताएं पर्यावरणीय प्रभाव, बिजली बिलों में वृद्धि और जीवन की गुणवत्ता से जुड़ी हैं। कई जगहों पर स्थानीय समुदाय सड़कों पर उतर आए हैं और परियोजनाओं को रोकने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं।5d54cc

नॉर्दर्न वर्जीनिया, जो दुनिया का सबसे बड़ा डेटा सेंटर हब है, में पहले से ही सैकड़ों सुविधाएं मौजूद हैं और और भी कई प्रस्तावित हैं। यहां के निवासी खेती की जमीन, पानी और बिजली पर पड़ने वाले दबाव की शिकायत कर रहे हैं। इसी तरह स्कॉटलैंड के Auchtertool में एक प्रस्तावित 600 मेगावाट AI डेटा सेंटर के खिलाफ स्थानीय लोग प्रदर्शन कर रहे हैं।

पर्यावरणीय लागत कितनी भारी?

बिजली की भूख: AI डेटा सेंटर पारंपरिक डेटा सेंटरों की तुलना में कहीं ज्यादा बिजली खपत करते हैं। International Energy Agency (IEA) के अनुमान के मुताबिक, 2030 तक ग्लोबल डेटा सेंटर बिजली खपत दोगुनी होकर 945 TWh पहुंच सकती है। अमेरिका में यह कुल बिजली खपत का 6-12% तक जा सकती है।

पानी का संकट: कूलिंग के लिए ये सेंटर भारी मात्रा में पानी इस्तेमाल करते हैं। एक बड़े सेंटर रोजाना लाखों गैलन पानी खपत कर सकता है, जो छोटे शहर जितना होता है। सूखे वाले इलाकों में यह स्थानीय जल स्रोतों को प्रभावित कर रहा है।

कार्बन उत्सर्जन: ज्यादातर बिजली जीवाश्म ईंधन से आती है, जिससे CO2 उत्सर्जन बढ़ रहा है। Cornell यूनिवर्सिटी के अध्ययन के अनुसार, 2030 तक AI डेटा सेंटर सालाना 24-44 मिलियन मीट्रिक टन CO2 उत्सर्जित कर सकते हैं।

भारत पर क्या प्रभाव?

भारत में भी AI और डेटा सेंटर सेक्टर तेजी से बढ़ रहा है। विशेषज्ञ चेतावरी दे रहे हैं कि अगर पर्यावरणीय मानकों का पालन नहीं किया गया तो देश में भी बिजली ग्रिड पर दबाव, पानी की कमी और प्रदूषण की समस्या बढ़ सकती है। कुछ राज्यों में पहले से ही डेटा सेंटर परियोजनाओं को पर्यावरण मंजूरी मिलने में देरी हो रही है।

कंपनियों का बचाव और चुनौतियां

टेक कंपनियां (जैसे Google, Meta, Microsoft) दावा कर रही हैं कि वे रिन्यूएबल एनर्जी की ओर बढ़ रही हैं और कुशल टेक्नोलॉजी इस्तेमाल कर रही हैं। लेकिन पर्यावरणविद् और स्थानीय समुदाय कह रहे हैं कि वादों और हकीकत में बड़ा अंतर है। NAACP जैसी संस्थाएं फ्रंटलाइन कम्युनिटीज में इन सेंटरों के स्वास्थ्य प्रभावों (वायु प्रदूषण, शोर) पर चिंता जता रही हैं।

निष्कर्ष

AI निस्संदेह भविष्य की तकनीक है, लेकिन इसका विकास टिकाऊ तरीके से होना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि बेहतर रेगुलेशन, स्मार्ट साइटिंग और ग्रीन टेक्नोलॉजी के बिना AI का पर्यावरणीय बोझ अगले संकट का रूप ले सकता है। सरकारों और कंपनियों को अब स्थानीय समुदायों की चिंताओं को गंभीरता से लेना होगा।

(यह रिपोर्ट विभिन्न अंतरराष्ट्रीय सर्वे, IEA रिपोर्ट्स और हालिया समाचारों पर आधारित है।)

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