चुनावी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) में भारी उथल-पुथल: ममता बनर्जी की बैठक रद्द, 100 से ज्यादा पार्षदों और कई प्रवक्ताओं का इस्तीफा
चुनावी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) में भारी उथल-पुथल: ममता बनर्जी की बैठक रद्द, 100 से ज्यादा पार्षदों और कई प्रवक्ताओं का इस्तीफा
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में मिली करारी हार के बाद सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर असंतोष, बिखराव और राजनीतिक उथल-पुथल का दौर शुरू हो गया है। हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि पार्टी अध्यक्ष ममता बनर्जी की अध्यक्षता में रविवार को बुलाई गई नवनिर्वाचित विधायकों की समीक्षा बैठक को ऐन वक्त पर रद्द करना पड़ा, क्योंकि पार्टी के 80 विधायकों में से लगभग तीन-चौथाई (75%) विधायक बैठक में शामिल होने पहुंचे ही नहीं। इसके साथ ही जमीनी स्तर पर पार्टी में बड़ी भगदड़ मच गई है, जहां 100 से ज्यादा पार्षदों और कई वरिष्ठ प्रवक्ताओं ने एक साथ अपने पदों से इस्तीफा दे दिया है।
विधायकों की अनुपस्थिति पर विवाद: ‘आपात स्थिति’ या अंदरूनी बगावत?
ममता बनर्जी के कालीघाट स्थित आवास पर होने वाली इस बैठक का मुख्य उद्देश्य चुनावी नतीजों की समीक्षा करना और आगे की रणनीति तय करना था। इतनी बड़ी संख्या में विधायकों के न पहुंचने पर राजनीति गर्मा गई है:
TMC प्रवक्ता कुणाल घोष का तर्क: उन्होंने विधायकों की गैर-मौजूदगी का बचाव करते हुए कहा कि पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी और सांसद कल्याण बनर्जी पर हुए कथित हमलों के बाद राज्य में ‘आपात स्थिति’ बनी हुई है। हमारे विधायक जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के खिलाफ हो रही पुलिस कार्रवाई और विरोध प्रदर्शनों को संभालने में व्यस्त हैं, इसलिए बैठक में नहीं आ सके।
सांसद कीर्ति आजाद का दावा: टीएमसी सांसद कीर्ति आजाद ने एक अलग ही दावा करते हुए कहा कि हमारे विधायकों को डराया-धमकाया जा रहा है और उन्हें घेर कर रखा गया है, जिसके कारण वे अपने घरों से बाहर नहीं निकल पाए और बैठक रद्द करनी पड़ी। वहीं कपिल सिब्बल के एक बयान पर पलटवार करते हुए कीर्ति आजाद ने बीजेपी पर निशाना साधा और कहा कि बीजेपी सभी को बर्बाद कर रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना: हालांकि, बंगाल की राजनीति को करीब से देखने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि यह अनुपस्थिति केवल सुरक्षा का मुद्दा नहीं, बल्कि ऐतिहासिक हार के बाद पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ विधायकों के भीतर पनप रहे असंतोष और बेचैनी का सीधा नतीजा है।
शीर्ष से लेकर जमीनी स्तर तक इस्तीफों की झड़ी (भगदड़ की पूरी सूची)
चुनाव परिणाम सामने आने के बाद से तृणमूल कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे में इस्तीफों की बाढ़ आ गई है। पार्टी के कई बड़े चेहरों से लेकर स्थानीय निकायों के प्रतिनिधियों ने सामूहिक रूप से पार्टी से किनारा कर लिया है:
1. संगठनात्मक व प्रवक्ता स्तर पर इस्तीफे
बिस्वजीत देब: टीएमसी प्रवक्ता पद से इस्तीफा।
शांतनु सेन: टीएमसी प्रवक्ता पद से त्यागपत्र।
अरुप चक्रवर्ती: टीएमसी प्रवक्ता पद से इस्तीफा।
काकोली घोष: पार्टी के सभी संगठनात्मक पदों से खुद को अलग किया।
अभिजीत मजूमदार: असम टीएमसी प्रमुख के पद से इस्तीफा देकर पार्टी को बाहरी राज्यों में भी बड़ा झटका दिया।
2. स्थानीय निकायों और पार्षदों (Councillors) के सामूहिक इस्तीफे
ममता बनर्जी की हार का असर जमीनी स्तर पर स्थानीय निकायों में साफ दिखने लगा है, जहां एक साथ 100 से अधिक पार्षदों ने पद छोड़ दिए हैं:
डायमंड हार्बर (अभिषेक बनर्जी का क्षेत्र): 8 टीएमसी पार्षदों का इस्तीफा
चंदननगर: मेयर राम चक्रवर्ती समेत 30 टीएमसी पार्षदों का इस्तीफा
भाटपाड़ा: 30 टीएमसी पार्षदों का सामूहिक इस्तीफा
गारुलिया: 18 टीएमसी पार्षदों का इस्तीफा
हलिशहर: 16 टीएमसी पार्षदों का इस्तीफा
उत्तर बैरकपुर: चेयरमैन मलय घोष समेत 15 पार्षदों का इस्तीफा
कांचरापाड़ा: 14 टीएमसी पार्षदों का इस्तीफा
विपक्ष हमलावर, डैमेज कंट्रोल में नाकाम दिख रहा टीएमसी नेतृत्व
इस अभूतपूर्व राजनीतिक संकट ने पश्चिम बंगाल में विपक्षी दलों (विशेषकर मुख्य सत्ताधारी दल बीजेपी) को टीएमसी पर चौतरफा हमला करने का एक बड़ा मौका दे दिया है। विपक्ष का साफ दावा है कि ममता बनर्जी के नेतृत्व से अब उनकी अपनी ही पार्टी का भरोसा उठ चुका है और कई नेता अपने राजनैतिक भविष्य को सुरक्षित करने के लिए नए विकल्प तलाश रहे हैं।
दूसरी तरफ, टीएमसी का शीर्ष नेतृत्व इन सामूहिक इस्तीफों को ‘सामान्य संगठनात्मक प्रक्रिया’ और ‘जमीनी फेरबदल’ बताकर नुकसान को कम आंकने (डैमेज कंट्रोल) की कोशिश कर रहा है। लेकिन राजनीतिक जानकारों के अनुसार, इतनी बड़ी संख्या में शीर्ष प्रवक्ताओं और नगर पालिकाओं के मेयर व पार्षदों का एक साथ जाना यह साफ करता है कि राज्य में टीएमसी की जमीनी पकड़ बेहद तेजी से खिसक रही है और ममता बनर्जी के लिए इस भारी डैमेज को संभालना अब आसान नहीं रह गया है।
