उत्तराखंड

​चंपावत केस में नया मोड़: सामूहिक दुष्कर्म की कहानी निकली ‘झूठी साजिश’, पुलिस जांच में हुआ बड़ा खुलासा

चंपावत में नाबालिग से सामूहिक दुष्कर्म के जिस मामले ने पूरे उत्तराखंड को झकझोर दिया था, उसमें अब एक बड़ा और चौंकाने वाला मोड़ सामने आया है। पुलिस की एसआईटी (SIT) जांच में यह सनसनीखेज खुलासा हुआ है कि यह पूरी घटना एक सुनियोजित साजिश थी, जिसे बदले की भावना से रचा गया था।

​चंपावत केस में नया मोड़: सामूहिक दुष्कर्म की कहानी निकली ‘झूठी साजिश’, पुलिस जांच में हुआ बड़ा खुलासा

​चंपावत पुलिस ने वैज्ञानिक और तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर स्पष्ट किया है कि नाबालिग के साथ दुष्कर्म की घटना नहीं हुई थी, बल्कि उसे मोहरा बनाकर निर्दोष लोगों को फंसाने का षड्यंत्र रचा गया था।

​साजिश का मुख्य सूत्रधार: कमल रावत

​पुलिस जांच (Modus Operandi) के अनुसार, कमल रावत नामक व्यक्ति ने अपने निजी बदले की पूर्ति के लिए नाबालिग बालिका को बहला-फुसलाकर और झूठा प्रलोभन देकर इस पूरे घटनाक्रम को रचने के लिए उकसाया था।

​जांच में कैसे खुली पोल? (विवेचनात्मक कार्यवाही)

​सीसीटीवी और सीडीआर (CDR): घटना वाले दिन पीड़िता की गतिविधियां सीसीटीवी फुटेज और कॉल रिकॉर्ड्स से मेल नहीं खातीं। वह अपनी मर्जी से दोस्त के साथ विवाह समारोह में गई थी।

​मेडिकल रिपोर्ट: चिकित्सीय परीक्षण में किसी भी तरह के संघर्ष, चोट या जबरदस्ती के कोई निशान नहीं मिले हैं।

​नामजद व्यक्तियों की लोकेशन: जिन तीन व्यक्तियों (विनोद सिंह, नवीन सिंह और पूरन सिंह) पर आरोप लगाए गए थे, तकनीकी साक्ष्यों से पुष्टि हुई है कि वे घटना के समय मौके पर मौजूद ही नहीं थे।

​असामान्य कॉल रिकॉर्ड्स: घटना के दिन कमल रावत, पीड़िता और उसकी महिला मित्र के बीच बार-बार फोन पर बातचीत हुई, जो साजिश की ओर इशारा करती है।

​पुलिस अधीक्षक का सख्त संदेश

​चंपावत एसपी रेखा यादव ने बताया कि पुलिस ने प्रत्येक तथ्य का निष्पक्ष परीक्षण किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि:

​किसी भी निर्दोष व्यक्ति को बेवजह प्रताड़ित नहीं किया जाएगा।

​महिला और बाल अपराधों पर पुलिस की ‘Zero Tolerance’ नीति है, लेकिन झूठे आरोप लगाने वालों को भी बख्शा नहीं जाएगा।

​यदि जांच में तथ्य पूरी तरह मनगढ़ंत पाए जाते हैं, तो दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

​आम जनता और मीडिया से अपील

​पुलिस मुख्यालय उत्तराखंड ने मीडिया और आम जनता से अनुरोध किया है कि प्रकरण की संवेदनशीलता को देखते हुए भ्रामक सूचनाएं न फैलाएं और केवल सत्यापित तथ्यों पर ही भरोसा करें।

​निष्कर्ष: चंपावत पुलिस की इस त्वरित और वैज्ञानिक जांच ने न केवल निर्दोष लोगों को जेल जाने से बचाया, बल्कि कानून का दुरुपयोग करने वालों के चेहरे भी बेनकाब कर दिए हैं। फिलहाल, डिजिटल और फॉरेंसिक साक्ष्यों का विस्तृत परीक्षण जारी है।

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