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सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: ‘PIL अब पब्लिसिटी और पॉलिटिकल इंटरेस्ट लिटिगेशन बन गई है’

सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: ‘PIL अब पब्लिसिटी और पॉलिटिकल इंटरेस्ट लिटिगेशन बन गई है’

​नई दिल्ली: सबरीमाला मंदिर मामले में 9 जजों की संविधान पीठ के सामने 11वें दिन की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने ‘इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन’ द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) की वैधता और मंशा पर गंभीर सवाल उठाए।

​”इसे कूड़ेदान में फेंक देना चाहिए”

​सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसी याचिका को शुरुआत में ही खारिज कर देना चाहिए था। उन्होंने कहा, “ऐसे दस्तावेज़ को तो सीधे कूड़ेदान में फेंक देना चाहिए था। अगर किसी पुजारी के कदाचार की खबर थी, तो उससे आपको PIL दाखिल करने का अधिकार कैसे मिल गया?”

​PIL के बदलते स्वरूप पर चिंता

​जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने जनहित याचिकाओं के दुरुपयोग पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा:

​PIL अब अक्सर पब्लिसिटी इंटरेस्ट, प्राइवेट इंटरेस्ट, पैसा इंटरेस्ट और पॉलिटिकल इंटरेस्ट लिटिगेशन में बदल गई है।

​आजकल खबर छपवाना आसान है, लेकिन क्या हर पत्र को PIL मान लिया जाए?

​कोर्ट वास्तविक और जरूरी कारणों के लिए ही PIL सुनता है।

​वकीलों के संगठन पर सवाल: “क्या कोई और काम नहीं है?”

​अदालत ने याचिकाकर्ता संगठन से पूछा कि एक वकीलों की संस्था का धार्मिक मुद्दों से क्या लेना-देना है?

​कोर्ट का सवाल: क्या एक कानूनी संस्था की कोई धार्मिक आस्था हो सकती है? क्या आप देश के मुख्य पुजारी हैं?

​नसीहत: जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि यंग लॉयर्स एसोसिएशन को बार के कल्याण और ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले संघर्षरत युवा वकीलों के लिए काम करना चाहिए, न कि ऐसे मामलों में समय बर्बाद करना चाहिए।

​याचिकाकर्ता की दलील

​एसोसिएशन के वकील ने बचाव में कहा कि यह याचिका संगठन की महिला सदस्यों की ओर से दायर की गई थी, जो भगवान अय्यप्पा के प्रति आस्था रखती हैं। उन्होंने तर्क दिया कि जब मंदिर के मुख्य पुजारी से जुड़ा विवाद सामने आया, तो यह भगवान अय्यप्पा के हित का सवाल था। उन्होंने यह भी कहा, “हमारी महिला सदस्य पहले एक हिंदू महिला हैं, वकील बाद में। यह उनके स्त्रीत्व पर हमले जैसा है।”

​वर्तमान स्थिति: सुप्रीम कोर्ट इस मामले में “संवैधानिक नैतिकता” और धार्मिक अधिकारों के संतुलन की जांच कर रहा है। फिलहाल मामले की सुनवाई जारी है और कोर्ट के इस कड़े रुख ने भविष्य की जनहित याचिकाओं के लिए एक नज़ीर पेश की है।

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