हिमालय का ‘मेल्टडाउन’: तेजी से पिघल रहे हैं ग्लेशियर, 200 करोड़ लोगों की प्यास और सुरक्षा पर मंडराया संकट
हिमालय का ‘मेल्टडाउन’: तेजी से पिघल रहे हैं ग्लेशियर, 200 करोड़ लोगों की प्यास और सुरक्षा पर मंडराया संकट
दुनिया की ‘तीसरी धुरी’ (Third Pole) कहे जाने वाले हिमालय पर गहरा संकट मंडरा रहा है। हालिया ICIMOD (इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट) की 2026 की रिपोर्ट ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, साल 2000 के बाद से हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार दोगुनी हो गई है। यह केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं है, बल्कि भारत सहित एशिया के 8 देशों की करीब 200 करोड़ (2 बिलियन) आबादी के अस्तित्व पर खतरा है।
तबाही के आंकड़े: क्या कहती है ताज़ा रिपोर्ट?
वैज्ञानिकों ने सैटेलाइट और जमीनी अध्ययन के आधार पर कुछ डरावने तथ्य पेश किए हैं:
बर्फ की घटती चादर: पिछले तीन दशकों (1990-2020) में हिमालय ने अपनी 12% बर्फ खो दी है।
गायब होते छोटे ग्लेशियर: 0.5 वर्ग किमी से छोटे ग्लेशियर सबसे तेजी से पिघल रहे हैं। भूटान में ही पिछले 50 वर्षों में 500 से अधिक छोटे ग्लेशियर पूरी तरह खत्म हो चुके हैं।
बढ़ती गहराई: 1975 के बाद से ग्लेशियरों की मोटाई में लगभग 27 मीटर की गिरावट आई है।
50 करोड़ भारतीय सीधे निशाने पर
भारत की तीन प्रमुख नदियां— सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र—पूरी तरह इन ग्लेशियरों पर निर्भर हैं। इन नदी घाटियों में रहने वाली 50 करोड़ से अधिक आबादी के लिए यह रिपोर्ट ‘डेथ वारंट’ जैसी है:
पीने के पानी का संकट: शुरुआत में बर्फ पिघलने से नदियों में पानी बढ़ेगा, लेकिन एक समय के बाद ये नदियां ‘मौसमी’ (Seasonal) बनकर रह जाएंगी और गर्मियों में सूखने लगेंगी।
खेती और भुखमरी: उत्तर भारत का ‘अन्न भंडार’ (Indo-Gangetic Plain) इन नदियों के पानी से ही सींचा जाता है। पानी की कमी का मतलब है खाद्य सुरक्षा का खत्म होना।
पनबिजली (Hydropower) पर ब्रेक: भारत के कई बड़े बांध इन्हीं नदियों पर बने हैं। ग्लेशियर खत्म होने से बिजली संकट पैदा हो सकता है।
टिक-टिक करते ‘वॉटर बॉम्ब’ (GLOFs)
ग्लेशियर पिघलने से पहाड़ों के बीच बड़ी-बड़ी झीलें बन रही हैं। जब इन झीलों के प्राकृतिक बांध टूटते हैं, तो GLOF (Glacial Lake Outburst Flood) जैसी आपदा आती है, जैसा हमने केदारनाथ और सिक्किम में देखा था। ISRO के अनुसार, हिमालय में ऐसी 600 से ज्यादा झीलें हैं जो किसी भी समय तबाही मचा सकती हैं।
विशेषज्ञ की चेतावनी: “हिमालय अब अपनी ‘टिपिंग पॉइंट’ (Tipping Point) की ओर बढ़ रहा है। यदि ग्लोबल वार्मिंग को 1.5°C तक नहीं रोका गया, तो इस सदी के अंत तक हिमालय के दो-तिहाई ग्लेशियर इतिहास बन जाएंगे।”
बचाव का रास्ता: क्या कर रही है सरकार?
सरकार अब ‘NISAR’ (NASA-ISRO SAR) मिशन के जरिए अंतरिक्ष से ग्लेशियरों की पल-पल की निगरानी कर रही है। साथ ही, सीमावर्ती इलाकों में ‘अर्ली वार्निंग सिस्टम’ लगाए जा रहे हैं ताकि बाढ़ आने से पहले लोगों को बचाया जा सके। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन कम नहीं होगा, हिमालय को बचाना मुश्किल होगा।
ब्यूरो रिपोर्ट, पर्यावरण एवं जलवायु डेस्क
