बंगाल में बीजेपी की राह रोक रही मुस्लिम वोट बैंक, आंकड़ों में छिपा है असली खेल
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 की तैयारियां तेज हैं, लेकिन बीजेपी का ‘मिशन बंगाल’ अब भी अधूरा लग रहा है। आजतक की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि बीजेपी का रथ रोकने वाली असल ताकत ममता बनर्जी नहीं, बल्कि मुस्लिम वोटर हैं। आंकड़े बताते हैं कि राज्य की 27-30% मुस्लिम आबादी (2011 सेंसस के अनुसार 27%, कुछ अनुमान 30% से ज्यादा) लगातार टीएमसी के साथ खड़ी है, जिससे बीजेपी को सत्ता तक पहुंचने में सबसे बड़ी चुनौती मिल रही है।
पश्चिम बंगाल में कुल 294 विधानसभा सीटों में से लगभग 112 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम वोटर निर्णायक हैं (30% से ज्यादा मुस्लिम आबादी वाली सीटें)। 2021 विधानसभा चुनाव में टीएमसी ने इनमें से 106 सीटें जीतीं, जबकि बीजेपी सिर्फ 5 पर सिमट गई। मुस्लिम-प्रभावित क्षेत्रों में बीजेपी का वोट शेयर बढ़ा, लेकिन जीत नहीं मिली। 2024 लोकसभा चुनाव में भी यही ट्रेंड दिखा – टीएमसी ने 29 सीटें जीतीं, बीजेपी को सिर्फ 12 मिलीं। मुस्लिम बहुल दक्षिण बंगाल में टीएमसी ने भारी जीत दर्ज की, जबकि उत्तर में वोट बंटवारे से बीजेपी को फायदा हुआ।
ममता बनर्जी की रणनीति साफ है: मुस्लिम वोट बैंक को मजबूत रखना। 2011 से लगातार तीन बार सत्ता में आने का मुख्य कारण मुस्लिम वोटों का एकजुट होना माना जाता है। 2021 में आईएसएफ जैसे मुस्लिम-आधारित दलों के साथ गठबंधन की कोशिश हुई, लेकिन मुसलमानों ने टीएमसी को ही चुना। रिपोर्ट्स के मुताबिक, मुस्लिम वोटरों में टीएमसी का समर्थन 80-90% तक रहता है, क्योंकि वे बीजेपी को ‘हिंदुत्व एजेंडा’ और CAA-NRC जैसे मुद्दों से जोड़कर देखते हैं।
बीजेपी का दावा है कि मुस्लिम वोट बैंक ‘अपील’ से नहीं टूट रहा, जबकि हिंदू वोटर जागरूक हो चुके हैं। लेकिन आंकड़े उलटे कहानी बयां करते हैं – मुस्लिम-प्रभावित सीटों पर बीजेपी का स्ट्राइक रेट लगभग जीरो रहा। 2026 में अगर मुस्लिम वोटर एकजुट रहे, तो टीएमसी का ‘खेला हবে’ फिर से दोहराया जा सकता है। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि बंगाल में सियासी समीकरण मुस्लिम वोटों के इर्द-गिर्द घूमते हैं, और बीजेपी को इसे तोड़ने के लिए नई रणनीति की जरूरत है।
यह ‘खेला’ सिर्फ ममता vs मोदी नहीं, बल्कि वोट बैंक की असली ताकत का है – जहां मुस्लिम वोटर निर्णायक साबित हो रहे हैं।
